Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 6 January:
अभिव्यक्ति के साहित्यिक आंदोलन के पचास वर्ष
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था की 2024 की पहली गोष्ठी 6 जनवरी को सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी के सहयोग से उनकी सभागार में अभिव्यक्ति के संयोजक विजय कपूर के आयोजन में की गई, जिसकी मेजबानी कवि रजनी पाठक ने की। कार्यक्रम का सफल संचालन उद्घोषिका, कवि और रंगकर्मी बबिता कपूर ने किया।


इस साल के मई माह में अभिव्यक्ति अपनी 50 वर्ष की यात्रा को संपूर्ण करेगा। स्वर्गीय डॉक्टर वीरेंद्र मेंहदीरत्ता की छत्रछाया में इस संस्था में भारत के जाने माने साहित्यकारों ने शिरकत की है, जिसमें हजारी प्रसाद द्विवेदी, उपेंद्रनाथ अश्क और कृष्ण बलदेव वैद जैसी अनेक हस्तियां शामिल रही हैं। अभिव्यक्ति की आगमन से चंडीगढ़ में जिस सार्थक साहित्य आन्दोलन की शुरुआत हुई वो एक वृहद रूप में आज समाज को अपना साहित्यिक योगदान दे रही है।
गोष्ठी के पहले सत्र में कविताओं का खूब बोलबाला रहा। परमिंदर सोनी ने “खिला रहे चेहरा हमेशा/ चाहे जो हो हाल/ हम तो बस हँसना ही जानें/ यही तो है बवाल, राजिंदर सराओ ने पंजाबी कविता “झूठ जो मैं जित्तन ना दित्ता”, वीणा सेठी ने “आ भी जाओ की तुम्हें देखने को जी करता है/ मान जाओ ना सताओ की तुम्हें मनाने को जी करता है”, रजनी पाठक ने “अक्सर हम रिश्ते निभाते-निभाते उलझ जाते/कैसे रखें क़ायम सब समझ न पाते”, गणेश दत्त ने “आया नव वर्ष,स्वागत करें सृष्टि हुई मतवाली है”, निम्मी वशिष्ठ ने पंजाबी में “चल अड़िया हथ फड़ आपां तुर चलिए चंन दी सैर नू/बण जाइए यार तारियां दे नां मोडीं पिछे हुण पैर तूं”, नेहा ने “आई है एक नन्ही परी लेकर ढेर खुशियाँ”, रोहित ने “इज़ाजत हो तो मुझे इस lockdown में अपने मन के एक कोने में जगह दे देना”, रेखा ने “जीवन संगीत के हर गीत में तुमको मिलूँगी
हार हो या जीत हो हर रीति में तुमको मिलूँगी”, सतिंदर गिल ने “भारतीय घरों में रौनकें हर समय रहा करतीं हैं/ खुशियों की मुस्कुराहटें समुंदर सी बहा करती हैं”, अल्का कांसरा ने “सुख भी अपने दुख भी अपने/ धूप में चलते चलते छांव ढूंढता बंजारा”, रजनीश कुमार ने “धरती या आसमां में ढूंढे तुम्हें कहां से”, अश्वनी कुमार भीम ने “बादल इक छोटा सा”, सारिका धूपड़ ने “क्यों फ़िक्र करते हो?/ गर किसी ने तुम्हे दर्द दिया दर्द की उम्र कहाँ लम्बी होती है?”.
डॉक्टर नवीन गुप्ता ने “बस उसकी हर बात में हां मिलाई जाए/वो चाहता है दोस्ती इस तरह निभाई जाए”, डॉक्टर विमल कालिया ने “बस,या तो उठ और कर/या, फिर फलसफ़ा भर खाली लम्हों में”, डॉक्टर राजवंती मान ने “डोमस ओरिया की खातिर/सर हिलाने का मतलब हर बार उजालों की स्वीकृति नहीं होता”, प्रसून प्रसाद ने प्रेम को परिभाषित करती अद्भुत कविता प्रस्तुत की।
दूसरे सत्र में डॉक्टर पंकज मालवीय ने “गले की फांस’ कहानी के जरिए जीवन की एक मामूली घटना से उत्पन्न भ्रम पर व्यंग्य प्रस्तुत किया। अश्वनी कुमार भीम ने व्यंग्य लेख “भूत”, डॉक्टर विमल कालिया ने कहानी “शहर की खबर”, सुभाष शर्मा ने पंजाबी में “दहलीज” नाम की मार्मिक कहानी प्रस्तुत कर नारी जीवन की व्यथा कथा प्रस्तुत की।

