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अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था का स्वर्ण

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 6 April:
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था का स्वर्ण
पचासवें वर्ष की यात्रा में अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था ने अप्रैल माह की गोष्ठी का आयोजन कवि और कहानीकार परमिंदर सोनी के निवास स्थान फाल्कन व्यू में किया जिसे अभिव्यक्ति के संयोजक, साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने संचालित किया।
इस मौके पर अभिव्यक्ति के संस्थापक स्वर्गीय डॉक्टर वीरेंद्र मेंहदीरत्ता और स्वर्गीय डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया जी के असीम योगदान पर कई साहित्यकारों ने चर्चा की। परमिंदर सोनी ने दोनों के अद्भुत व्यक्तिव और उनके साहित्यिक प्रेम पर अपनी बात रखी। अलका कांसरा ने डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया की जीवनी बराज ऑफ़ मेमोरीज़ पर अपनी बात रखते हुए उनके जीवन संघर्ष पर प्रकाश डालते हुए यह बताया कि उन्होंने कैसे असंख्य साहित्यकारों और रंगकर्मियों को उत्साहित किया और तराशा।
इस गोष्ठी के पहले सत्र में कविताओं का बोलबाला रहा। ऊषा पाण्डेय ने “यादों की पगडंडी पर जब थक जाते पग चलते चलते वहीं कहीं पर रजनीगंधा बन तुम झरते मेरे मन में”, आर के सुखन ने “ग़मों से बच के निकल भी जाया करो दुःखों को हरदम ना गले लगाया करो।” विजय कपूर ने, “सेकना होगा अनकही आंच को, तब कभी मिलेगा आदमी होने कीपीड़ा से अवकाश।”
डॉक्टर प्रसून प्रसाद ने “इस बेचैन दौर में/कुदरत के इस बेहद रमणीय ठौर में/हम लिखें नहीं,भोगें इतिहास/जो जीवन भर अनरीता रहे/स्मृतियों में अशेष रहे/आओ खेलें बसंत का/ ऐसा महारास!” परमिंदर सोनी ने “चला जाये उस पार कोई तो बातें तब भी होती हैं सीधे न सही
गुफ्तगुऐं रूह से होती हैं पर बातें तब भी होती हैं” और पंजाबी की कविता “एह चुप चुपीते रोवण छड दे खुल के दिल दे भांबण कड दे।”
सुशीरा गुलाटी ने “अलफाज़ जिस दास्तां को पूरी नहीं कर पाते, उस हसीं दास्तां को मुकम्मल करती है यह आंखें।” डॉक्टर निर्मल सूद ने “रेल के सफ़र सी ज़िंदगी,चलती रेल पीछे छूटता गाँव, क़स्बा,शहर व घर।” सतिंदर कौर ने “मेरे बच्चे विदेश से जब मुझको फोन लगाते हैं , तो मेरी कम ही सुनते हैं और अपनी अधिक बताते हैं।” अमरजीत अमर ने “पत्थर को भी पानी पानी कर देगा वो लहरों के नाम जवानी कर देगा।” निम्मी वशिष्ठ ने “चरखा मेरा कूकदा ते पीड़ हो गई दूणी वे तू मैंनू चेते आवंदा,जद हथ्थ फड़ां मैं पूणी !” डॉक्टर रोमिका वढेरा ने “बात नही ये हम दोनो की, लम्हों की गठरी है।” मोनिका कटारिया ने ” बनी कब , कब उखड़ी सड़क राहगीर को बस चलने से ग़रज़।” अश्वनी भीम ने ” कठिन बहुत है क्रोध को अपने पी जाना। धैर्य शान्ति से जीवन सारा जी जाना।”
रेखा मित्तल ने “बड़ी शिद्दत से सहेज कर समेट कर रखी है मैंनें हमारी कुछ हसीं शामें।” रजनी पाठक ने ” नारी अनमोल रतन धन है
नारी सोना है हीरा है  नारी काजल है आँखों का मीरा है वह ममीरा है।” डॉक्टर विमल कालिया ने “मेरे उदय से होता है उदय तुम्हारा,
ढलते ही मेरे सो जाता है,जहां सारा।” रीना मदान ने, “स्नेह प्यार की प्रीत, बन गए तुम मेरे मीत।” सीमा गुप्ता सच जो तुमने देखा जो मैंने देखा, वो नहीं देखने से जो रह गया महसूस किया एक उलझन बनकर जो दिमाग़ में जम गया। डॉ सारिका धूपड़ ने “नहीं शिकायत तन्हाई से, हरगिज़ मुझे। मेरे जज़्बातों को, कभी ये तन्हा, रहने नहीं देती।”
वीणा सेठी ने “तुम्हें तो जिद्द थी पास आने की, मुझे ख्वाहिश थी नजदीकियां बढ़ाने की मुझे मेरी तलब ने मार दिया, तुम्हें तो आदत थी दिलों को तोड़ जाने की।”अमरजीत अमर ने “मंज़िलों की राह में जितनी मुसीबत आएगी पाँव में चलने की ख़ातिर उतनी हिम्मत आएगी।” राजिंदर सराओ ने “जीवन दी इसी दुपहर विच किसे दे कदमा दी आवाज दिल ते दस्तक देन लगदी है ते दिल उडारी मार ओहना कदमा ते जा डिगदा है” जैसी अंतर्मन को  छूने वाली कविताओं का सुंदर पाठ किया। दूसरे सत्र में नृपोदय सिंह रतन ने दिलचस्प संस्मरण “काफी दा कप” पढ़ा। अश्वनी भीम ने अपने व्यंग्य “बस अड्डा तथा सब्जी मंडी” के ज़रिए खूब गुदगुदाया।
डॉक्टर सपना मल्होत्रा ने “तर्पण” नाम की संजीदा कहानी का पाठ किया। डॉक्टर विमल कालिया की लघु कहानी “कालजयी कृति” खूब बन पड़ी। सुभाष शर्मा ने दिलचस्प लघु कहानी, “अफसर दा बाप” पढ़ी। डॉक्टर पंकज मालवीय ने, संस्मरण “अनुवाद” पढ़ा जिसमें  साइबेरिया की यात्रा और स्थानीय लोगों के जीवन से परिचय प्राप्त करने की कोशिश है।इनके अलावा बबिता कपूर , डॉक्टर अशोक वढेरा, दर्शना सुभाष पाहवा, अन्नु रानी शर्मा, रश्मि शर्मा और खुशनूर कौर ने भी गोष्ठी में भाग लिया।

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