Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 1 Feburaru:
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था द्वारा सृष्टि प्रकाशन और सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी चंडीगढ़ के सहयोग से डॉ.अशोक वढेरा के नवीन कहानी संग्रह “वो खिड़की वाली सीट” का विमोचन 31 जनवरी को दुपहर 2 बजे सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी की सभागार में आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे श्री प्रेम ओझा और विशेष अतिथि थीं श्रीमती आराधना। पुस्तक पर समालोचनात्मक पत्र साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ निर्मल सूद, साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर एवं साहित्यकार और शिक्षाविद सुरेन्द्र सोनी काकड़ोद थे। इस कार्यक्रम में एक विशेष काव्य गोष्ठी का आयोजन भी हुआ, जिसमें अभिव्यक्ति से जुड़े कवि शामिल रहे। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन किया अभिव्यक्ति के अध्यक्ष विजय कपूर का। मेज़बानी थी डॉ रोमिका वढेरा की। पुस्तक पर समालोचना करते हुए साहित्यकार विजय कपूर ने कहा”समग्र रूप से ये कहानियां अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाली यात्राएं हैं।” साहित्यकार सुरेन्द्र सोनी काकड़ोद ने कहा” डॉ. वडेरा जी की रचनाएँ, लघु-कथा होने की सभी शर्तों- आकार में संक्षिप्त, गहराई से केंद्रित, संरचना और कथानक से सीमित, शिक्षा केंद्रित होना आदि को पूरा करती है।”


डॉ निर्मल सूद ने कहा “मुख्य अतिथि श्री प्रेम ओझा ने कहा “इस कथा–संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता में छिपी गहराई है। लेखक ने बहुत सहज भाषा में जीवन के जटिल अनुभवों को पिरोया है।” विशेष अतिथि अनुराधा ओझा ने कहा “डॉ अशोक वढ़ेरा जी की कहानी पुस्तक” वो खिड़की वाली सीट”बहुत ही रोचक और आम इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हुई है।” गेस्ट ऑफ ऑनर गुरदयाल पारस ने कहा “वो खिड़की वाली सीट” कहानी संग्रह की भाषाशैली, पात्र चरित्र चित्रण और कालक्रम सब बड़े ही व्यवस्थित, सुगठित, रोचक और प्रेरणास्पद है।” गोष्ठी के दूसरे सत्र में कविताओं का बोलबाला रहा। इसमें डॉ. प्रसून प्रसाद की कविता “वह दिन कितना चमत्कारी, परिश्रमसाध्य पर विस्मयकारी, मीठे-मीठे सृजन की हिस्सेदारी।” में सृजन की प्रक्रिया को महत्व दिया गया है। विजय कपूर की रचना “इतने हल्केपन में क्या घना रहा, छूट गए पर साथ बना रहा” में विरोधाभास का सुंदर प्रयोग किया गया। ‘हल्केपन’ और ‘घनेपन’ के माध्यम से कवि उन यादों की बात कर रहे हैं जो दूर होकर भी हमारे भीतर गहरी पैठी होती हैं।
डॉ. तिलक सेठी की रचना “इतनी तेजी से बदली है ये दुनिया… अपनी ही सूरत बेगानी लगती है।” आधुनिकता और समय की क्रूर गति पर चोट है। सुदर्शन सुभाष पाहवा की कविता “पता न चला, तुम्हारी ख़ामोशी, मुझ से करने लगी बात।” में मौन की भाषा’ का चित्रण है जो गहरे प्रेम या जुड़ाव का प्रतीक है। शिप्रा सागर की कविता”आज बसंत बाहर, तपन की बात न करना” में ‘बसंत’ सुख का और ‘तपन’ दुखों का प्रतीक है कि बात सामने आती है। रेखा मित्तल की कविता “हर बार माँ कुछ बदली सी… झुर्रियों वाले हाथ मगर नरम एहसास।” में वात्सल्य और समय के प्रभाव का चित्रण है। अपूर्वा रवि सौंध की रचना “चलो आज हम फिर अजनबी हो जाए, चलो आज हम फिर थोड़े दूर हो जाए” में अजनबी होने का अर्थ रिश्ते को किसी कड़वाहट से बचाने या उसे एक नए सिरे से देखने की कोशिश दिखती है। आर. के. सुखन की रचना” जैसा समझते हो मुझे, वैसा नहीं हूं मैं, हरगिज़ खुली किताब के जैसा नहीं हूं मैं” में व्यक्ति के व्यक्तित्व की परतों का वर्णन होता है। सतिंदर गिल की कविता “एक दोस्त ऐसा चाहिए जो हर समय उपलब्ध हो, दोस्ती निभाने हेतु जो सदैव प्रतिबद्ध हो” में ‘प्रतिबद्धता’ को दोस्ती की बुनियाद माना गया है। शहला जावेद की कविता “यादों को झाड़ना-पोंछना था… जाने कैसे मन में खिंची एक खरोंच थी” में मन की सफाई का मनोवैज्ञानिक चित्रण दिखता है। अश्वनी भीम की कविता “जहां राम हैं वहां काम नहीं, जहां काम है, हो कैसे राम वहां” में ‘राम’ (अध्यात्म) और ‘काम’ (सांसारिक वासना) के बीच के चुनाव को स्पष्ट किया गया है।
राजेश आत्रेय की रचना “अभी भी वक्त है संभल जा ए नादां दिल, कभी इंसा से भी, इंसा बन के तो मिल” में मानवता का संदेश सुंदरता से उभरा। डॉ. अर्चना आर. सिंह की रचना “वह वहाँ मौजूद था, विशाल और धूसर, उस जगह को घेरे हुए जहाँ हम बातें और खेला करते थे” में ‘विशाल और धूसर’ बिम्ब किसी गहरी उदासी या किसी अनकहे बोझ का प्रतीक हो सकता है, जो बचपन या पुरानी यादों की जगह पर काबिज़ हो गया है। डॉ. सुनीत मदान की रचना “आँख में मेरी कुछ देर से, कुछ तो अटका है” में अधूरे सपने की ओर संकेत है। नीरू मित्तल की रचना “चल कर्मपथ पर, अंगारों से डरना कैसा, थकना है वर्जित, लंबी सांसें भरना कैसा।” में वीर रस और प्रेरणा का पुट रहा। इस आयोजन में …. चमन लाल चमन, मीना सूद, मंजुला वालिया, डॉ नीज़ा सिंह, डॉ सपना मल्होत्रा….ने भी भाग लिया। गोष्ठी के दूसरे सत्र में कविताओं का बोलबाला रहा। इसमें डॉ. प्रसून प्रसाद की कविता “वह दिन कितना चमत्कारी, परिश्रमसाध्य पर विस्मयकारी, मीठे-मीठे सृजन की हिस्सेदारी” में सृजन की प्रक्रिया को महत्व दिया गया है। विजय कपूर की रचना “इतने हल्केपन में क्या घना रहा, छूट गए पर साथ बना रहा” में विरोधाभास का सुंदर प्रयोग किया गया। ‘हल्केपन’ और ‘घनेपन’ के माध्यम से कवि उन यादों की बात कर रहे हैं जो दूर होकर भी हमारे भीतर गहरी पैठी होती हैं। डॉ. तिलक सेठी की रचना “इतनी तेजी से बदली है ये दुनिया… अपनी ही सूरत बेगानी लगती है।” आधुनिकता और समय की क्रूर गति पर चोट है।
सुदर्शन सुभाष पाहवा की कविता “पता न चला, तुम्हारी ख़ामोशी, मुझ से करने लगी बात” में मौन की भाषा’ का चित्रण है जो गहरे प्रेम या जुड़ाव का प्रतीक है। शिप्रा सागर की कविता “आज बसंत बाहर, तपन की बात न करना।” में ‘बसंत’ सुख का और ‘तपन’ दुखों का प्रतीक है कि बात सामने आती है। रेखा मित्तल की कविता “हर बार माँ कुछ बदली सी… झुर्रियों वाले हाथ मगर नरम एहसास” में वात्सल्य और समय के प्रभाव का चित्रण है। अपूर्वा रवि सौंध की रचना “चलो आज हम फिर अजनबी हो जाए, चलो आज हम फिर थोड़े दूर हो जाए” में अजनबी होने का अर्थ रिश्ते को किसी कड़वाहट से बचाने या उसे एक नए सिरे से देखने की कोशिश दिखती है।आर. के. सुखन की रचना “जैसा समझते हो मुझे, वैसा नहीं हूं मैं, हरगिज़ खुली किताब के जैसा नहीं हूं मैं” में व्यक्ति के व्यक्तित्व की परतों का वर्णन होता है।
सतिंदर गिल की कविता “एक दोस्त ऐसा चाहिए जो हर समय उपलब्ध हो, दोस्ती निभाने हेतु जो सदैव प्रतिबद्ध हो” में ‘प्रतिबद्धता’ को दोस्ती की बुनियाद माना गया है।
शहला जावेद की कविता “यादों को झाड़ना-पोंछना था… जाने कैसे मन में खिंची एक खरोंच थी” में मन की सफाई का मनोवैज्ञानिक चित्रण दिखता है।
अश्वनी भीम की कविता “जहां राम हैं वहां काम नहीं, जहां काम है, हो कैसे राम वहां” में ‘राम’ (अध्यात्म) और ‘काम’ (सांसारिक वासना) के बीच के चुनाव को स्पष्ट किया गया है। राजेश आत्रेय की रचना “अभी भी वक्त है संभल जा ए नादां दिल, कभी इंसा से भी, इंसा बन के तो मिल” में मानवता का संदेश सुंदरता से उभरा। डॉ. अर्चना आर. सिंह की रचना “वह वहाँ मौजूद था, विशाल और धूसर, उस जगह को घेरे हुए जहाँ हम बातें और खेला करते थे” में ‘विशाल और धूसर’ बिम्ब किसी गहरी उदासी या किसी अनकहे बोझ का प्रतीक हो सकता है, जो बचपन या पुरानी यादों की जगह पर काबिज़ हो गया है। डॉ. सुनीत मदान की रचना “आँख में मेरी कुछ देर से, कुछ तो अटका है” में अधूरे सपने की ओर संकेत है। नीरू मित्तल की रचना “चल कर्मपथ पर, अंगारों से डरना कैसा, थकना है वर्जित, लंबी सांसें भरना कैसा” में वीर रस और प्रेरणा का पुट रहा। इस आयोजन में …. चमन लाल चमन, मीना सूद, मंजुला वालिया, डॉ नीज़ा सिंह, डॉ सपना मल्होत्रा, विजय सोदाई, डॉ राठौर, हरमन रेखी,अन्नू रानी शर्मा ने भी भाग लिया।

