Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 7 September:
अभिव्यक्ति साहित्य संस्था की गोष्ठी में डॉक्टर सारिका धूपड़ के काव्य संग्रह “उद्गार” का विमोचन हुआ
अभिव्यक्ति की सितंबर माह की गोष्ठी सृष्टि प्रकाशन के सहयोग से आयोजित की गई जिसमें डॉक्टर सारिका धूपड़ के काव्य संग्रह “उद्गार” का विमोचन डॉक्टर चंदर त्रिखा, विजय कपूर और डॉक्टर गुरदीप गुल धीर के करकमलों से हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर चंदर त्रिखा ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा “अपनी रचनाओं के माध्यम से अनूठी संभावनाओं की गवाही देती हैं डॉक्टर सारिका।”
साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने अपनी टिप्पणी में कहा “सुख दुःख से सजी-पगी इनकी रचनाएं मस्तिष्क के कई द्वारों पर दस्तक देती हुई, नैतिक मूल्यों के दायरे में चुनौतियों को स्वीकार करने की झंडाबरदार दिखती हैं।” डॉक्टर गुरदीप गुल धीर ने कहा “सारिका अपने खुलूस और सादगी से दिल की बात कहती हैं जिसे सुना जाना चाहिए।” डॉक्टर प्रांजल धूपड ने लॉन्च को कंडक्ट किया।


गोष्ठी के दूसरे सत्र में 30 कवियों और कहानिकारों ने अपनी सारगर्भित रचनाओं संग भाग लिया, जिसकी मेज़बानी डॉक्टर सारिका धूपड़ और संचालन साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया। गोष्ठी के इस सत्र में डॉक्टर नवीन गुप्ता ने “तुझसे बिछड़ कर कुछ रोज़ तो तेरा इंतजार बहुत रहा/ फ़िर भूख का मसअला तुझे भूलाने में मददगार बहुत रहा।” डॉक्टर सारिका धूपड़ ने “ज़िन्दगी के अस्थिर पलड़े पर, न कोई कम, न कोई ज़्यादा है सही-गलत, खुशी और गम, दोनों का भाग, आधा-आधा है।”
विजय कपूर ने “मुश्किल होता है लौटना कुछ भी बिसारकर/ कोहरे की चादर ओढ़े बिंदास बिखरती है मुक्ति।” राजिंदर सराओ ने “छिटककर चांद का हाथ चांदनी ज़मी पर आ गई ढूंढता रहा चांद ,सितारा सितारा आसमां में। रश्मि शर्मा ने “हम कभी दोग़ली नहीं कहते बात पर आपकी नहीं कहते ख़ाक कर दती है ये सब सपने, आग को रोशनी नहीं कहते।” अमरजीत अमर ने “कभी कुछ पूछने का आपको अधिकार कब था जिसे पूजा गया है वो ख़ुदा साकार कब था।” अमर अश्वनी भीम ने “तुम ही प्रेम पूर्ण मन की मेरे इच्छा हो अभिलाषा हो अभिव्यक्त हुई जो वाणी में वो प्रेम परिभाषा हो।” वीणा सेठी ने “मैं हूं और नहीं भी/ अंत भी और अनंत भी।”
दर्शना सुभाष पाहवा ने “सख्य भाव में होता अभिन्नत्व और प्रेम की धार। सख्य रस में माधुर्य भरा और दिव्य उद्गार।” परमिंदर सोनी “खामोशी को ज़ुबाँ क्यों नहीं दी क्यों धुआँ छाँट आवाज़ नहीं दी अंगार जब साँसों संग छाती तक पहुँच गया क्यों विरेचन की राह न ली। डॉक्टर निर्मल सूद ने “कितने हिस्सों में बँटी होगी टूटी, बिखरी आहत हुई होगी द्रौपदी … जब माँ ने बिन देखे कह दिया जाओ पाँचों भाई बाँट लो। डॉक्टर अर्चना आर सिंह ने “गेहूं और गुलाब गुण से लदे दोनों समृद्ध, और रूप में भी मोहक विशुद्ध, एक सोने के दाने, एक रूप का भंडार, दोनों की तुलना नहीं है दरकार!” शहला जावेद ने “तुरपाई इस ज़िंदगी में वक़्त वक़्त पर हर चीज़ की करनी पड़ती है तुरपाई फिर चाहे वो दर्द हो ज़ख़्म हो या हो जज़्बात की सिलाई।”
हरमन रेखी ने “पर्व था दिवाली, ऊपर से रात भी काली, चांदनी होती तो उसका आंचल ओढ़ लेते, किसी अपने का साथ मिल जाता, तो शायद बात को वहीँ मोड़ देते।” सीमा गुप्ता ने “अपने ही सागर में डूबती उतरती शून्य होती क्षीण होती आंखों को किस नाम से पुकारुं।” विमल कालिया ने “तुम्हारा छोटा सा हिस्सा यहीं रह गया था। संभाल कर रख दूं या भूल जाऊं।” राजेश बेनीवाल ने “सपना किसी का टूट गया है तो मुझे क्या अपना कोई जो रूठ गया है तो मुझे क्या।” सरिता मलिक ने “अपनी मुश्किलों से न मायूस हो घबराना तुम, हो मुकाबिल, हो मुसलसल हां, हो एक ज़माना तुम।”
बबिता कपूर ने “दरखतों पर मत ऊकेरना मेरा नाम/ दरख्तों को मेरे नाम से पुकार लेना।” डॉक्टर कुमार कृष्ण ने “सत्यमेव जयते तीन शेरों में जकड़ा सत्य का मुहावरा है/पता नहीं क्यों लटका है इस सदी की दीवार पर।” डॉक्टर प्रसून प्रसाद ने “ज़रूरी है/फल के कठोर बीज का फूटना/ताकि वह अपना ह्रदय सूर्य के आगे खोल कर रख दे/ज़रूरी है/आत्मा के कमल का पंखुड़ी दर पंखुड़ी दर खुलना।”
सुभाष भास्कर ने “धरा हरी ममता भरी देती खूब प्यार/धरा का करना चाहिए मां जैसा सत्कार।” जैसी अद्भुत रचनाओं का बहुत सुंदर पाठ किया। गोष्ठी के तृत्य सत्र में नृप उदय सिंह ने सुंदर कहानी “मिठ्ठी जही कॉफी” का पाठ किया। डॉक्टर विमल कालिया ने कालजई कहानी “छोटी बात बड़ा किस्सा” का बढ़िया पाठ किया। हरमन रिखी ने अपनी दिलचस्प लघु कहानी “प्रथम” को सुनाया। रेखा मित्तल ने अपनी कहानी पकोड़ियां सुनाई। इस आयोजन में डॉक्टर नवीन गुप्ता विभागाध्यक्ष माइक्रोबायोलॉजी विभाग, पंजाब यूनिवर्सिटी का विशेष योगदान रहा।

