Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 1 March:
चंडीगढ़ के पहले नायक के रूप में जाने जाने वाले स्वर्गीय डॉक्टर कैलाश अहलूवालिया जी के नाम पर स्थापित साहित्यिक सम्मान समारोह का भव्य आयोजन सम्मान संस्था द्वारा अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी और और सृष्टि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में सेन्ट्रल स्टेट लाइब्रेरी में किया गया। इस समारोह के द्वारा चंडीगढ़ और आसपास के बहुत से जाने-माने साहित्यकारों ने शिरकत की। भारत के प्रसिद्ध वरिष्ठ कवि प्रोफेसर कुमार कृष्ण इस आयोजन में विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। हिंदी साहित्य की कहानी और काव्य विधा के लिए साहित्यकार, रंगकर्मी और शिक्षाविद डॉक्टर कैलाश अहलूवालिया स्मृति सम्मान 2023/24 की पुस्तकों पर साहित्य जगत के प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा की गई गहन समीक्षा और विचार-विमर्श के बाद घोषित किया गया था। निम्नलिखित साहित्यकारों की कृतियों को सम्मानित करने पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
काव्य विधा के लिए प्रथम पुरस्कार डॉक्टर प्रियंका भारद्वाज को उनकी पुस्तक “आसमान में धान” को दिया गया। डॉक्टर प्रियंका पेशे से सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर और जानी-मानी उभरती हुई कवि हैं। द्वितीय पुरस्कार डॉक्टर निर्मल सूद को उनकी पुस्तक “शब्दों के परिंदे” को दिया गया। डॉक्टर निर्मल सूद सरकारी कॉलेज की रिटायर्ड प्रिंसिपल और जानी मानी कवि हैं। तृतीय पुरस्कार केंद्रीय सरकार से सेवा निवृतअधिकारी, कवि मंजीत शर्मा को उनके संग्रह “ऐसे गीत सुनाने होंगे” के लिए दिया गया।


कहानी विधा में प्रथम पुरस्कार कहानीकार, कवि और डेंटल सरजन डॉक्टर विमल कालिया “विमल” को उनके कहानी संग्रह “हां, मैं औरत” के लिए दिया गया।
द्वितीय पुरस्कार कवि, व्यंग्यकार, कहानीकार और पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट में सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत अश्वनी भीम को उनके कहानी संग्रह “बहन कहती थी” के लिए दिया गया। तृतीय पुरस्कार, बैंकिंग सेवा से निवृत अधिकारी, कवि और कहानीकार नीरू मित्तल “नीर ” को उनके कहानी संग्रह “कोहरे से झांकती धूप” के लिए दिया गया। प्रोफेसर कुमार कृष्ण ने डॉक्टर कैलाश के व्यक्तिव पर बात करते हुए कहा “प्रेम की जुस्तजू, प्रकृति के साथ गुफ़्तगू और पलायन की पीड़ा के नायक का नाम कैलाश आहलुवालिया है। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न आवाज़ को ज़िंदा रखने के लिए , उनकी स्मृति में कविता तथा कथा-साहित्य में प्रति वर्ष श्रेष्ठ रचनाकारों को सम्मानित करने का निर्णय प्रशंसनीय है।”
संस्था के निदेशक साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने अपनी बात रखते हुए कहा “विस्थापन की त्रासदी से गुजर कर चंडीगढ़ के पहले नायक बने डॉक्टर कैलाश अहलूवालिया शिक्षा साहित्य और रंगमंच के एक ऐसे गुरु थे जिनके सानिध्य में अनेक कवि, कहानीकार और अभिनेता पनपे और प्रसिद्ध हुए” सृष्टि प्रशासन के उपाध्यक्ष डॉक्टर करम चंद ने अपने विचार रखते हुए कहा” अद्भुत सकून की अनुभूति होती थी, डॉक्टर कैलाश अहलूवालिया से मिलकर। उनकी रचनाधर्मिता को अनेक पीढियां याद करती रहेंगी।”
कार्यक्रम के दौरान अभिव्यक्ति द्वारा काव्य गोष्ठी और कहानी पाठ का भी आयोजन हुआ। गोष्ठी के दूसरे सत्र में कविताओं का बोलबाला रहा। डॉक्टर प्रियंका भारद्वाज ने “तुम्हारे साथ में मुझे लगा… जरूरी है कविता की अलमारी खोलना और लिखना शब्दों से परे हमारे बीच खड़ी पृथ्वी का तापमान”, विजय कपूर ने “आओ उन उग्र बिंदुओं की अड्डेबाजी में दखल दें कि इससे पहले चुक जाएं”, रेखा मित्तल ने “मैं एक व्यक्ति हूँ, एक समाज का हिस्सा, जुड़ा हुआ एक दूसरे के साथ, विचारों की धारा में बहता हुआ, और एक नई दिशा की ओर बढ़ता हुआ”, करीना मदान ने “पीर पराई है”, मोनिका कटारिया ने “काम अपना निकालने को निंदा करता जाये व्यक्तित्व दूजों का वो उलझाता जाये”, डॉक्टर नवीन गुप्ता नवीं ने “ग़लती उसकी थी और सर झुका दिया मैंने कछ यूं इक रिश्ता टूटने से बचा लिया मैंने”, नीरू मित्तल नीर ने “कभी तो आदमी पहचान पाएगा आदमी को देख पाएगा आईना और पीठ पर लगे खंजर”, डॉक्टर रोमिका वढेरा ने “खुली आंखों से बोले हैं कुछ सपने”, अपूर्वा सौंध ने “सुनो तुम लड़ रहे हो मगर क्या जानते हो किसको हराओगे? जो जान गए फिर जीत लोगे या हार जाओगे”, आर के सौंध ने “बहुत दिन हो गये थे तुमसे मिले हुए,आ जाओ; कि मैं तो बस तुम्हें देखना चाहता हूं”, रजनी पाठक ने “महाकुंभ महापर्व है आया”, आर के सुखन ने “कभी तो दाद खुल कर दे, कभी तो तू मुकर्रर कर हसद में मुझसे जलने की कोई तो हद मुकर्रर कर”, नवनीत बक्शी ने “दो लड़कों के मैने देखा ढलती शाम के अंधेरे में सिगरेट की चांदी तले आग जलाकर धुआं सूंघते”, डॉक्टर निर्मल सूद ने गोष्ठी ने “सर्द हवा कड़कती ठण्ड दरवाज़े बंद बंद खिड़कियों के चढ़ें परदे लिहाफ़ में दुबके काँपते से हम” पढ़ी।
अलका कांसरा ने “यह घर हैं या ईंट सीमेंट की दीवारें न ज़मीं अपनी न छत अपनी”, डॉक्टर सत्यभामा ने “चिपके रहे एक दूजे से आस्तीन के बटन सरीखे तन मन”, अमरजीत अमर ने “इतनी पोशीदा वो अपनी दास्ताँ रखता रहा साथ रह कर भी वो अक्सर दूरियाँ रखता रहा”, डॉक्टर सुनीत मदान ने “क्यों होती है स्मृतियों को आकार देने की मानवीय ज़रुरत जब आख़िर सब कुछ वापिस मिट्टी से मिलना है”, डॉक्टर प्रसून प्रसाद ने “सत्य सामयिक है, शाश्वत नहीं यही कहती है नदी, नदी सबसे कुछ नहीं कहती केवल उसी को चुनती जो भावी चिंतन हेतु हो बेशक़ीमती”, डॉक्टर विमल कालिया विमल ने “दुनिया का कुछ नहीं जाता बातें बनाना फितरत है उनकी हमें ही सीखना होगा, एक कान से सुनना,दूसरे से निकाल देना होगा”, गोष्ठी के तीसरे सत्र में डॉक्टर पंकज मालवीय ने अपनी कहानी चंद्र शेखर आजाद पढ़ी, डॉ विमल कालिया ने कहानी हां मैं औरत की एनीमेटेड रीडिंग की। डॉक्टर अशोक वढेरा ने कहानी तड़प पढ़ी, ज़रीना नग़मी ने लघु कहानी डॉक्टर बलबीर सिंह पढ़ी। इस दौरान डॉक्टर निजा, पिंकी शालू सहरावत, बबिता कपूर, राजेंद्र सराओ, विजय सोदाई, हरमन रेखी और खुशनूर भी शामिल रहे। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन सम्मान संस्था के निदेशक और अभिव्यक्ति के संयोजक साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया।

