Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 3 March:
हिंदी-विभाग पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ एवं चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ के संयुक्त तत्वावधान से पंजाब विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में “भारतीय वाङ्मय में सैनिक विमर्श : अनुभव, संघर्ष और राष्ट्रीय अस्मिता” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य सैनिकों के अनुभवों का साहित्यिक विश्लेषण करना था। उद्घाटन सत्र में हिंदी विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी संयोजक प्रो. अशोक कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की प्रासंगिकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। डॉ० अश्वनी शांडिल्य (असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, पंचकूला) ने परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा तथा कीर्ति चक्र विजेता कर्नल मनप्रीत सिंह के जीवन और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उद्घाटन भाषण में श्री विशाल बत्रा (व्यवसाय प्रमुख, रक्षा, सरकारी और संस्थागत बैंकिंग, आई. सी. आई. सी. आई. बैंक लिमिटेड, मुंबई) ने अपने भाई कैप्टन विक्रम बत्रा से जुड़ी यादों को सांझा करते हुए उनके शौर्यमयी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘वर्दी से बड़ी कोई शान नहीं होती और देश सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।’ बीज वक्तव्य में डॉ. अरुण कुमार (प्राचार्य, पी. एम. श्री केंद्रीय विद्यालय क्रमांक 1, पटियाला छावनी) ने भारतीय वाङ्मय में सैनिक विमर्श पर अपने विचार प्रस्तुत किए। विशिष्ट अतिथि श्रीमती जगमीत ग्रेवाल (व्याख्याता अर्थशास्त्र, एजुसेट, हरियाणा, सैक्टर-2, पंचकूला) ने सैनिकों के शौर्य और उनके जीवन से प्रेरित लेखन के ऊपर अपने विचार साझा किए।


तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. मधुलिका बेन पटेल (सह-आचार्य, हिंदी-विभाग, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा) ने की। इस सत्र में मुख्यातिथि की भूमिका में श्री बलदेव सिंह (सेवानिवृत्त, एयर वाइस मार्शल) तथा विशिष्ट अतिथि की भूमिका में श्री हरिन्द्रपाल सिंह सराओ (सेवानिवृत्त, ग्रुप कैप्टन) उपस्थित रहे। विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित डॉक्टर अनिल पाण्डेय (सहायक आचार्य, हिंदी-विभाग, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा), डॉ. अलका शर्मा बोस (संयुक्त निदेशक, उच्चतर शिक्षा हरियाणा, शिक्षा सदन, सेक्टर-5, पंचकूला) तथा डॉ. भरत सिंह (सहायक आचार्य, हिंदी-विभाग, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला) ने हिन्दी साहित्य में सैनिक विमर्श विषय को आधार बनाकर साहित्य में चित्रित सैनिकों की मनःस्थिति एवं उनके जीवन से प्रभावित रचनाओं पर अपने विचार सांझा किए। इस सत्र के अंत में विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा पंजाब विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों, महाविद्यालयों के विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों द्वारा विषय आधारित शोध पत्रों की प्रस्तुति दी गई। समापन सत्र में मुख्य अतिथि की भूमिका में श्री दीपक बत्रा (समाज सेवी, पूर्व सैनिक परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पंजाब प्रांत) ने कहा कि ‘ऐसे विमर्श हमें कर्तव्य, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम के मूल्यों को आत्मसात करने की दिशा देते हैं।’ इस सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री बलकार विर्क (कर्नल (सेवानिवृत्त), 629 ई. एम. ई. बटालियन, मामून कॅट, पठानकोट), डॉ. मंजू चावला (मेजर (सेवानिवृत्त) वरिष्ठ चिकित्सक, सोहाना हॉस्पिटल, मोहाली), डॉ. बिहारी झा (निरीक्षक (राजभाषा), फ्रंटियर हेडक्वार्टर बी. एस. एफ. जालंधर), श्री सुभाष भास्कर (सचिव, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, चंडीगढ़) मौजूद रहे।
विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. अश्वनी शांडिल्य (असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, पंचकूला) ने मधु कांकरिया द्वारा रचित उपन्यास ‘सूखते चिनार’ में सैनिक विमर्श तथा डॉ. बलराम (सहायक आचार्य, राजकीय महिला महाविद्यालय, लाखन माजरा (रोहतक) ने सैनिक विमर्श और हिंदी साहित्य विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। समापन भाषण में प्रो. अशोक कुमार (संगोष्ठी संयोजक एवं अध्यक्ष, हिंदी-विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन समिति का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में श्री विक्रम सिंह, जे. डब्ल्यू. वी. (सेवानिवृत्त) भारतीय वायु सेना), श्री बजिंदर कुमार, (सार्जेंट (सेवानिवृत्त), भारतीय वायु सेना), श्री सुरजीत सिंह, सार्जेंट (सेवानिवृत्त, भारतीय वायु सेना) को विशेष सम्मान से अलंकृत किया गया।

