Chandigarh (sursaanjh.com bureaju), 28 July:
स्वप्न फाउंडेशन पटियाला और पंजाब कला परिषद, चंडीगढ़ द्वारा आज पंजाब कला भवन, सेक्टर-16 में सुरजीत सुमन की अप्रकाशित पुस्तक “पौणां दे पैरीं घुंघरू” पर विचार-चर्चा आयोजित की गई। सबसे पहले सुरजीत सुमन ने अपने गीत ‘सज्जणा पुआड़े हथिया’, ‘चंना बांह ना मरोड़ीं’ सुर में प्रस्तुत कर वाहवाही बटोरी। इसके बाद चर्चा की शुरुआत करते हुए शायर मंदर गिल ने कहा कि इस संग्रह की रचनाएँ छंद की विधि-विधान पर खरी उतरती हैं और उन्होंने कई छंदों के उदाहरण भी दिए। वरिष्ठ कहानीकार परमजीत मान ने अपनी बारी पर कहा कि इस संग्रह में ऐतिहासिक, पौराणिक, समकालीन सहित सभी रंग मौजूद हैं। गीतकार और गायक ध्यान सिंह काहलों ने कहा कि गीतों में एक लय और ताल होती है; शायर बेसुरा हो सकता है, लेकिन बेताला नहीं होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि सुरजीत सुमन इस कसौटी पर लगभग खरे उतरते हैं।


शायर राज कुमार साहोवालिया ने छपाई से पहले इस तरह की “बैठक” की सराहना की। उन्होंने कुछ शब्दों पर टिप्पणी करते हुए सुझाव दिया कि उनमें सुधार किया जाना चाहिए। अनुवादक और कहानीकार सुभाष भास्कर ने कहा कि इस तरह के गीत निश्चित रूप से आजकल के चल रहे अश्लील और हिंसक गीतों का मुकाबला कर सकते हैं। साहित्य प्रेमी और पाठक भुपिंदर सिंह मलिक ने विचार व्यक्त किए कि यह साहित्यिक गहराई वाले गीत हैं। भाषा, व्याकरण और शब्दों की सुंदर बुनावट की प्रशंसा की। उन्होंने गीतों की किताबें कम प्रकाशित होने पर चिंता भी जताई। कहानीकारा यतिंदर माहल ने कहा कि शायर को विषय से भटकना नहीं चाहिए। उन्होंने शब्दों की संरचना पर भी चर्चा की। विद्वान डॉ. दविंदर सिंह बोहा ने इस संग्रह को समाज की ओर लौटता हुआ कदम बताया। उन्होंने कुछ शब्दों की ध्वनि और प्रवाह को लेकर भी बात की।
पाठक और विद्वान प्रिंसिपल सतनाम सिंह शौकर ने कहा कि ये गीत व्यक्तिगत से आगे बढ़कर सामाजिक सरोकार की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि विचार कठिन है तो शब्दों का कठिन होना स्वाभाविक है। शायर सुखविंदर सिद्धू ने कहा कि गीत सबसे ज्यादा सुने जाने वाली विधा है। अगर खराब गीत आएंगे तो समाज पर बुरा असर पड़ेगा। ऐसे साहित्यिक गीत समाज को दिशा देंगे। पाल अजनबी ने शब्दों की जटिलता और रचना की बनावट पर कुछ बिंदु साझा किए। सेक्रेटेरिएट साहित्य सभा की ओर से मलकीअत सिंह औजला ने इन गीतों की रचना की साक्षी होने पर प्रकाश डाला और सुरजीत सुमन से अपने संबंध को साझा किया। आलोचक डॉ. तेजिंदर सिंह ने कहा कि सुरजीत सुमन का यह प्रकाशित होने जा रहा संग्रह अच्छी गीत परंपरा में वृद्धि करेगा। उन्होंने कहा कि सुरजीत सुमन कभी भी अपने समाज को दिशा देने वाले उद्देश्य से भटकते नहीं हैं। वरिष्ठ आलोचक डॉ. लाभ सिंह खीवा ने इस “बैठक” को एक सराहनीय प्रयास बताया। उन्होंने शायर को पुराने गीतकारों को भी पढ़ने की सलाह दी और चिंता जताई कि गीत को साहित्यिक और अकादमिक स्तर पर उचित स्थान नहीं मिला। उन्होंने अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्दों को अपनाने की आज़ादी का समर्थन किया और कहा कि सुरजीत सुमन पौराणिक मिथकों का सफलतापूर्वक प्रयोग करते हैं, जहाँ थोड़ी-बहुत कमी है, वह सुधारी जा सकती है। प्रवासी शायर गुरदेव चौहान ने दुनिया में गीतों को मिल रही पहचान पर बात की। मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ. योगराज ने गीत विधा के कई तकनीकी पक्षों पर महत्वपूर्ण बातें साझा कीं। उन्होंने कहा कि गीत लेखन रचना और संरचना का संतुलन है। उन्होंने सुरजीत सुमन को एक उभरता हुआ गीतकार बताया, साथ ही उनके गीतों की बनावट को लेकर कई प्रश्न भी उठाए।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक, शायर और उपन्यासकार डॉ. मनमोहन ने “बैठक” के समग्र प्रभाव पर बात करते हुए कहा कि किताब के छपने से पहले इस तरह के प्रयास महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने पूरी चर्चा को मूल्यवान बताया। सुरजीत सुमन की गीत रचना पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि एक गीत में चार ‘बंद’ (अंतरे) पर्याप्त होते हैं और ज्यादा नहीं लिखने चाहिए। उन्होंने सुरजीत सुमन को सहज रहने की सलाह भी दी। इस पूरे समारोह का संचालन स्वप्न फाउंडेशन, पटियाला के महासचिव, शायर और निबंधकार जगदीप सिद्धू ने कुशलता से किया। इस अवसर पर वरिष्ठ शायर सुरिंदर गिल, चेतना गिल, शायर सिमरन, गुरदेव सिंह, गुरदीप सिंह, जे. एस. महेरा, इंदरजीत प्रेमी, कहानीकार बलीजीत, कहानीकार सरूप स्यालवी आदि शामिल हुए।

