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मालिनी की कहानी/ सत्यवती आचार्य

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 14 November:
कहानी
मालिनी की कहानी/ सत्यवती आचार्य
मधुमालती की बेल, लाल सफेद फूलों के गुच्छों से लदी, खिड़की पर दोनों तरफ से ऊपर से ती हुई, लटक कर झूल रही थी l बेडरूम से, फूलों की लटकती लताएँ और उनका साया बहुत ही सुकून देता था l
मालिनी यही तो चाहती थी कि उसका छोटा सा, प्यारा सा एक घर हो l उसमें एक छोटा सा बाग़ हो l बगीचे में फूल और फल के पेड़ हों l वह कृष्ण की राधा की तरह सूर्योदय से पहले बगीचे से फूल तोड़ कर टोकरी में भर कर लाया करे l पंछियों के झुंड, हर समय उसके बगीचे में  चहचहाएँ, गीत गाएँ व खुशियाँ मनाया करेंl
घर में एक छोटा सा किचन-गार्डन हो l वहाँ माली को निराई-गोड़ाई व पौधों की देख-भाल करता हुआ देखा करेl गिलहरियों, तितलियों और पक्षियों के साथ समय बिताया करेl घर की ताज़ी सब्जियाँ तोड़ना उसे बहुत अच्छा लगता l सुबह -शाम और जब- तब, बगीचे में जाकर  छोटी-छोटी क्यारियों के इर्द-गिर्द घूम कर आना उसे बहुत सुकून देता है l उसने  उस बगीचे में समय बिता कर ख़ुद को अकेलेपन से निजात पाते हुए देखा है l प्रकृति का साथ उसे स्वयं से साक्षात्कार करने में सहयोग देता सा लगता है l
इसके अलावा घर वालों को, ताज़ी पालक तोड़कर उसके पकौड़े बनाकर खिलाना, ताज़ा पुदीना और धनिया तोड़ कर चटनी बनाना, अमरूद तोड़कर, पेड़ के नीचे बैठकर खाना उसे बहुत भाता हैl मालिनी की छोटी-छोटी खुशियाँ हैं, और है-उसकी प्यारी सी, सीधी -सादी सी ज़िंदगी l
खिड़की से छनकर सूरज की किरणें मालिनी के मुँह पर पड़ रही थीं l वह मुलायम बिस्तर पर, सफ़ेद चादर बिछा, नर्म तकियों के बीच, गाढ़ी नींद में सो रही  थी l सूरज की गर्म किरणे उसे थपथपा कर उठाने की कोशिश कर रही हों जैसे l
उसने करवट बदल कर फिर से सोने की कोशिश की l पर चिड़ियों की चहचहाहट, उनके मधुर गीत, मधुमालती की भीनी-भीनी खुशबू और सूरज की गर्म छुअन और तपन उसे मिलकर जगाने की कोशिश कर रहे थे l मालिनी को उषा काल में उठना बहुत अच्छा लगता है l पर न जाने आज क्या हुआ कि वह समय से न उठ सकी l सूरज को उगते हुए देखना उसे बहुत पसंद है l वह हमेशा पौ फटने से पहले ही उठ जाती है l सूरज, पक्षियों  और मधुमालती की खुशबू ने मिलकर उसे जगा ही दिया l मालिनी उठ खड़ी हुई l
“आज ऐसा क्या हुआ जो इतनी देर तक मैं सोती रह गई?”  ऐसा सोचते हुए वह बगीचे की ओर गई l थोड़ी देर यूँ ही अमरूद के पेड़ के नीचे  बैठी रही l जैसे नींद अभी भी टूटी न हो l जैसे वह उसी मधुर सपने  में हो l अचानक उसके सर पर एक फूल आ गिरा l गिलहरी, अमरूद के पेड़ पर अमरूद कुतर रही थी l
उनींदी सी बैठी मालिनी  की नींद अब अच्छी तरह टूट गई l उसने देखा कि सूरज काफ़ी ऊपर आ गया है l वह ख़ुद कहीं पीछे न रह जाए, यह सोच कर, भागती हुई अंदर गई l उसे तो आज बहुत कुछ करना था l करीब-करीब महीने भर बाद आज माधव ऑफिस के टूर से घर वापस लौटने वाला था l इस बार वह फिर गोहाणा गया था l जब भी गोहाणा जाता है, माधव दो चीज़ें ज़रूर लेकर आता है l  एक तो वहाँ  की देसी घी वाली रसीली जलेबी, जो ढाई सौ ग्राम की सिर्फ एक होती हैl यानि एक किलो में सिर्फ चार जलेबियाँ !  मालिनी को हमेशा रसीली मोटी जलेबियाँ ही पसंद आती हैं l कुरकुरी वाली जलेबी नहीं l
दूसरी चीज़ जो वह लेकर आता है, वह है-घेवर l घेवर का आनंद बहुत दिनों तक लिया जा सकता है l हरियाणा में नौकरी करने के कारण यहाँ के बारे में नई-नई चीज़ों के बारे में जानकर मालिनी बहुत खुश होती है l उसे यहाँ की भाषा बहुत आकर्षित करती है l यहाँ के गाँव की औरतों का घाघरा-चोली और बोरला उनकी ओढ़नी, ओढ़ने का तरीक़ा उसे कभी-कभी हैरान कर देता है l मालिनी हरियाणा के लोगों को मिलकर बहुत खुश होती है, क्योंकि उनकी बातों में सिर्फ हास्य का पुट ही नहीं होता बल्कि हाज़िरजवाबी और व्यंग्य का अनोखा मेल होता है l उसे फिर से घेवर याद आ गया और उसके मुँह में मधुर रस घोल गया l उसमें स्फूर्ति आ गई l आज उसे बहुत सारे काम करने थे l
गुलदस्ते में ताज़ा फूल सजाने थे l लिली के सफ़ेद फूल, फर्न के ताज़े नुकीले पत्ते और पुदीने की खुशबूदार टहनियों से, वह इकेबाना शैली में फ्लावर-अरेंजमेंट कर ही लगी उसने ऐसा सोचा l पति के पसंद के भोजन के अलावा कुछ अलग और ख़ास भी बनाना था आज उसे l घर के सारे काम खत्म कर तैयार होकर, फ़्री होकर उसके साथ बैठना था l बाज़ार जाकर फल भी लाने थे l
कदम्ब के पेड़ से अचानक एक पत्ता उसके सामने आ गिरा, जैसे कह रह हो सिर्फ ‘टु डू लिस्ट’ ही बनाती रहोगी या काम भी शुरू करोगी?”
उसे पेड़ के नीचे के पत्ते  बुहारना बहुत अच्छा लगता है l यह काम वह माली के लिए कभी नहीं छोड़ती है l उसने सोचा सबसे पहले यही कर लेती हूँ l
उसने देखा कि आज मोगरे के फूल बहुत ज़्यादा लगे हुए हैं l वे भी माधव के, घर वापस आने के बारे में जान कर बहुत ख़ुश हों, जैसे l मालिनी  अंदर से  टोकरी ले कर आई l ख़ूब  सारे मोगरे के फूल तोड़े l पूजा के लिए अड़हुल और अपराजिता के फूल भी तोड़ लिए l आज बगीचा भी खुश-ख़ुश सा लग रहा था l किचन-गार्डन में  पालक लहरा रहे थे, लाल टमाटर और भिंडी भी रसोई में आने को बेताब दिख रहे थे l पुदीने और हरी धनिया की चटनी, लहसुन के पत्ते के साथ बहुत ही अच्छा बनाती है मालिनी l सभी उँगलियाँ चाटते रह जाते हैं l उसने बाग़ में काफ़ी वक्त बिताया l पत्ते बुहारे, चिड़ियों व गिलहरियों के लिए मिट्टी के बर्तन में पानी भरा, दाने डाले, टोकरी भर फूल तोड़े, हरी ताज़ी भिंडी, पालक, हरी मिर्च और चटनी के लिए पुदीना तोड़े l बगीचे में वह घंटों समय बिता सकती है l पुराने दिनों को याद करते हुए वह बचपन के दिनों में खो गई l वह कैसे क्रॉटन के अलग अलग रंगों व अलग अलग आकार के पत्ते तोड़ कर किताबों में रखा करती थी l कैसे वह गुलाब के फूल किताबों में सहेज कर सपने बुना करती थी l अचानक मुंडेर पर एक कौआ आकर काँव-काँव करने लगा l जैसे किसी ने संदेश भेजा होकि देर हो रही है जल्दी करो l
उसने सोच लिया था कि अंकुरित मूंग की नारियल वाले मसाले की “घशी” बनाएगी l घूम फिर कर माधव को आख़िर दक्षिण भारतीय भोजन खाना ही पसंद है l उसके साथ उसने अरबी के पत्ते के पत्रोड़े बनाने की सोची l मीठे में, उसने मूंग दाल और चना दाल मिला कर नारियल के दूध से गुड़ वाली  खीर बनाने की योजना बनाई l उसने बड़े ही इत्मीनान से मोगरे का एक सुन्दर गजरा बनाया l फिर घर के काम में जुट गई l
दोपहर के बाद शाम तक उसके पास काफी समय खाली था। घर को समेटने के बाद उसने खुद को समेटने की कोशिश की। वह उल्लास और उत्साह से भरी हुई थी l उसने सोचा फिर से नहा लेती हूँ l नहा कर उसने अपने लिए एक प्याला चाय बनाई l और घर के अपने सबसे पसंदीदा कोने में जाकर बैठ गई l वह जगह है – कोज़ी सी, पौधों से सजी हुई छोटी सी बालकनी l
उसने यह वक्त, आराम से बैठ कर दिनकर के साथ बिताने की सोची l मालिनी को डायरीनुमा पुस्तकें पढ़ना बहुत पसंद है l आत्मकथात्मक पुस्तकें l ‘ऐन फ्रैंक की डायरी’, ‘डायरी ऑफ़ हैलेना मॉरली’, ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी’, उसकी पसंदीदा किताबें हैं l रस्किन बॉन्ड की पुस्तकों की उसने अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी बना रखी है अपने घर में l
“दिनकर की डायरी” उसने कुछ महीने पहले चंडीगढ़ के एक पुस्तक मेले से खरीदी थी l उसे वह इत्मीनान  से बैठ कर पढ़ना चाहती थी l
अदरक की गर्म चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उसने किताब उठाई l बिल्कुल नई, क्रिस्प किताब उसका दिल लुभा गई l उसने चाय पीते हुए उसका जायज़ा लिया l अनायास ही उसने किताब को सीने से लगा लिया और उस खूबसूरत क्षण को भरपूर जीने की कोशिश में उसे चूम लियाl नई किताब की मदमस्त खुशबू ने उसे भावुकता से सराबोर कर दिया l उसे स्कूल के स्वच्छन्द दिन याद आने लगे l जब वह हर किताब को उठा कर उसे महसूस किया करती थी l
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के लेखन में जहाँ एक ओर ओज  होता है,  क्रांति व आक्रोश होता है, वहीं दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति भी होती है l वे संस्कृत, बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी के भी बड़े जानकार थे l मालिनी को तरह-तरह की भाषाएँ सीखने का भी बहुत शौक हैl इसलिए उसे यह किताब वैसे भी बहुत आकर्षित करती है l तो आज के ये पल दिनकर के नाम कर वह गदगद हो गई l
शाम को सूरज लालिमा लिए हुए मुस्कुराता हुआ,  मालिनी को देख रहा था l आज बड़े दिनों बाद वह इतनी ख़ुश नज़र आ रही थी l तुलसी के गमले के सामने सूर्यास्त के बाद मालिनी ने दिया जलाया l अगरबत्ती से घर-आँगन महक उठा l शाम का धुंधलका छंटने लगा l रात ने  तारों की चादर बिछा दी l मुस्कुराता हुआ चाँद आसमान में निकल आया l
माधव आठ बजे आने वाला था l मालिनी सुबह से ही व्यस्त थी l आज चाँद के साथ बातें करने व समय बिताने का वक्त नहीं मिल पा रहा था l
वह ड्रेसिंग-टेबल पर कई बार आई ज़रूर थी, जहाँ से उसे चाँद नज़र आता था l पर फुर्सत ज़रा भी नहीं थी कि उसकी तरफ़ जी भर के देख ले, मुस्कुरा ले और कुछ बातें कर ले l आख़िर वह समय भी आ ही गया जिसका उसे इंतज़ार था l उसने आज अच्छे से श्रृंगार करने की सोची l अंदर की अलमारी  से सिंदूरी लाल रंग की रेशमी साड़ी निकाली, सलीके से धीरे-धीरे  पहनी l बड़ी सी लाल बिंदी लगाई, काजल लगाया, काँच की लाल चूड़ियाँ पहन कर आईने में देखती हुई खनकाने लगी l अनायास ही वाह गुनगुनाने लगी  “सुरमई शाम इस तरह आए, साँस लेते हैं, जिस तरह साए..”
अचानक उसकी नज़र उस पर पड़ी जो उसे लगातार खिड़की से देख रहा था l शर्म से  लाल हो, झट से सिंगारदान बंद कर, आईने के सामने  से उठ, मालिनी खिड़की तक गई पर वह ओझल हो चुका था l मालिनी खिड़की बंद किए बिना ही वापस आ गई l माधव को मोगरा बहुत पसंद है l मालिनी ने बालों के लटों को सँवार कर मोगरे के खूबसूरत गजरा लगाया l और वह चुपचाप, खामोशी से उसे देखता रहा l खिड़की से झाँक रहा था, रोज़ की तरह l रात भर उस विरहिणी का साथ वही तो देता था, जब माधव टूर पर होता था l मुस्कुराता,  खुशनुमा सा  चाँद l उसका एक मात्र प्यारा, बहुत ही दुलारा सहारा l
“माधव आता ही होगा” उसने चाँद से कहा और शरमा कर अंदर  चली  गई l वह देखता रह गया l
सत्यवती आचार्य, चंडीगढ़।

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