वो जा रही थी/ सत्यवती आचार्य, चंडीगढ़
माँ सूजी के लड्डू और मालपुए कमाल के बनाती थीं l तरह-तरह के अचार के तो क्या कहने। मजाल है, कभी कोई अचार ख़राब भी हो जाए!


उन्होंने सब कुछ नानी से सीखा था l पंचानबे वर्ष की नानी अब चंद दिनों की मेहमान थीं। वो जा रही थीं। इधर बेटी के घर चंद दिनों में शिशु के आगमन की पूरी तैयारी थी।
माँ को प्रकृति के इस अडिग, आवाजाही के नियम से निकलने का मार्ग भी, नानी ने सिखा दिया था। ज़रा भी देर किये बिना, वह आंखें मूंदकर जपमाला ले, बैठ गई।
सत्यवती आचार्य, चंडीगढ़

