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शब्दों के उत्सव में घुली साहित्यिक सुगंध: ‘अभिव्यक्ति’ द्वारा ट्राइसिटी के रचनाकारों का भव्य संगम

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 7 March:
साहित्यिक संस्था ‘अभिव्यक्ति’ द्वारा सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी, चंडीगढ़ के सहयोग से शनिवार को लाइब्रेरी के सभागार में एक गरिमामयी साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक चले इस कार्यक्रम में ट्राइसिटी (चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली) के प्रख्यात और उभरते हुए साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की मेजबानी प्रख्यात साहित्यकारा डॉ. निर्मल जसवाल ने की, जबकि संपूर्ण आयोजन और मंच संचालन ‘अभिव्यक्ति’ के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार विजय कपूर द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया।
काव्य सत्र: संवेदनाओं और दर्शन का अनूठा प्रवाह गोष्ठी के प्रथम सत्र में कवियों ने जीवन के विविध रंगों-प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता और स्त्री विमर्श को शब्दों में पिरोया। प्रमुख रचनाकारों की कृतियों के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं: डॉ. निर्मल जसवाल: “बिछड़े पतझड़ में कब, कब खिले वसन्त में, बहुत याद आते हैं… बरसात के छींटें, वो बेबाक़ से छींटें!”  विजय कपूर: “स्मृतियां आंख मूंद कर बैठ जाएं तो हाहाकार मचेगा, भूत नहीं होगा तो भविष्य भी नहीं बचेगा!” शिप्रा सागर (ग़ज़ल): “बात जब हद से गुज़र जायेगी, खुद ही सड़कों पर उतर आएगी।” अर्चना आर. सिंह: “बेख़ौफ़ आज़ादी का नारा लेकर, चलीं हैं बेटियाँ खुद अपना सहारा लेकर।”  तिलक सेठी: “काम सब आसान लगता मुश्किलों के बाद में, सीखता हर आदमी है गलतियों के बाद में।” ममता ग्रोवर: शक्ति-स्वरूपा जैसे शब्दों से अलंकृत करना रहने दो, उन्मुक्त गगन में बस समानता के पर दे दो।”
रविन्द्र टंडन: “ना मैं बाएँ ना मैं दाँएं… मैं कहीं का नहीं, पर विषाद में हूँ हर जगह।” सतिंदर गिल: “जब स्त्रियाँ किसी कारणवश तर्क नहीं कर पाईं, तब वे कुंद बुद्धि कहलाईं।”डॉ. विमल कालिया: “देख मैं कितनी जल्दी मान जाता हूँ, कभी किसी रोज़ मुझे मना कर तो देख।”
गोष्ठी में अमरजीत अमर , डॉ अशोक वडेरा, रश्मि शर्मा ‘रशमी’, अन्नू रानी शर्मा, नवनीत बक्शी, कुलतारण छतवाल, आर.के. सौंध, राजिंदर सराओ, राजेश आत्रेय, सीमा गुप्ता, दर्शना सुभाष पाहवा, डॉ. पारस, बी.बी. शर्मा, आर.के. ‘सुख़न’, रीना मदान, रजनी पाठक, कृष्णा गोयल, डॉ. रोमिका वढेरा, डॉ. निर्मल सूद, परमिंदर सोनी, डॉ. सत्यभामा, प्रतिभा सिंह और शीनू वालिया ने भी अपनी प्रभावशाली रचनाओं से गोष्ठी की गरिमा बढ़ाई। द्वितीय सत्र: कथा साहित्य और विमर्श गोष्ठी का दूसरा सत्र कहानी पाठ के नाम रहा। इस सत्र में साहित्यकारों ने मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ को स्वर दिया: डॉ. विमल कालिया ने अपनी संजीदा कहानी ‘दुविधा’ का एक अभिनव प्रयोग करते हुए ‘दिलचस्प एनिमेटिड पाठ’ किया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। सुनीत मदान ने अपनी कहानी ‘बादल के बीज’ का अत्यंत भावपूर्ण और सुंदर वाचन किया। मंजुला वालिया ने एक मर्मस्पर्शी कहानी साझा कर सत्र को पूर्णता प्रदान की। अंत में, ‘अभिव्यक्ति’ के अध्यक्ष विजय कपूर ने सभी आगंतुक साहित्यकारों और श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में वैचारिक चेतना और साहित्यिक अभिरुचि को जीवित रखने के लिए अनिवार्य हैं।
मीडिया संपर्क: विजय कपूर, अध्यक्ष,
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, चंडीगढ़ – 9217989809

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