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साहित्यकारों का महासंगम: डॉ. विमल कालिया के कहानी संग्रह “मुट्ठी भर झूठ, हथेली भर सच” का विमोचन एवं भव्य काव्य गोष्ठी

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 7 December:
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, चंडीगढ़ द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन में डॉ. विमल कालिया ‘विमल’ के नवीन कहानी संग्रह “मुट्ठी भर झूठ, हथेली भर सच” का विमोचन किया गया। पंचकुला के सेक्टर-2 स्थित ‘दंतंत्र’ में आयोजित इस कार्यक्रम का संयोजन और संचालन अभिव्यक्ति के अध्यक्ष, विजय कपूर ने किया। सृष्टि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस संग्रह को समालोचकों ने ‘वर्तमान समय का तीखा आईना’ और ‘बेजोड़ शिल्प’ की कहानियों का संकलन बताया। विमोचन के अवसर पर वक्ताओं ने डॉ. विमल कालिया की कहानियों की मनोवैज्ञानिक गहराई और सामाजिक यथार्थ के चित्रण की सराहना की। डॉ. प्रसून प्रसाद ने पुस्तक को असुविधाजनक तथ्यों से सामना कराने वाली कृति कहा।
विजय कपूर ने टिप्पणी की कि कहानियों के पात्रों का द्वंद्व ही उनका प्राण है, जो उन्हें कालातीत बनाता है। प्रोफेसर अलका कांसरा ने संग्रह की सधी हुई लयबद्ध भाषा और सटीक बिंबों की प्रशंसा की। डॉ. विमल कालिया ने कहा कि यह संग्रह उनके अनुभवों और अवलोकन का परिणाम है।
मासिक साहित्यिक गोष्ठी: कवियों और कहानीकारों की अभिव्यक्ति कार्यक्रम के दूसरे सत्र में, ट्राइसिटी के महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपनी ओजस्वी और भावपूर्ण रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कविता, कहानी और व्यंग्य का यह समागम साहित्य प्रेमियों के लिए एक यादगार शाम बन गया। प्रस्तुत किए गए कवितांश इस प्रकार रहे: डॉ. विमल कालिया ने ” मत लिखा करो, तुम / प्रेम पत्र में, मेरे प्रियतम / मैं, तुम से बहुत प्यार करती हूं।” विजय कपूर ने “शब्द स्पन्दित होते हैं / पर उनकी / क्यों कोई आवाज़ / सुनाई नहीं पड़ती!” डॉ प्रसून प्रसाद ने “ये हज़ारों वर्ष पुराने पेड़ /
आकाश में एक अलग दुनिया के प्रतीक/विभिन्न आयु के नमूनों का अस्तित्व!” ममता ग्रोवर “खुदा भी जब-जब / अपनी सब रचनाओं को / जाँचता होगा, / ‘माँ ‘ उसकी सर्वोत्तम रचना / जरूर यही आँकता होगा!” बबीता कपूर ने “पुकारना मेरा नाम/पहाड़ों पर इस तरह/ कि उसकी गूंज/पलटकर तुम तक पहुंचे!” राजेश आत्रेय ने ” देख के आधे चाँद को, या महसूस कर अपने प्यार को, / हर बार होती है शिकायत, / कि अधूरा सा क्यों हूँ मैं?” रजनी पाठक “चला जाएगा यह भी साल, छोड़ कर कुछ दिल में मलाल।”
निर्मल सूद ” बिताए जो पल संग तुम्हारे / वे पल बहुत याद आएँगे / हम तुम्हें न भूल पाएँगे, / समेटे थे मुठ्ठी में यादों के मोती / फिसल गए रेत की मानिंद!” नीरू मित्तल ने “कविता मेरी / चहक उठी महक उठी / चिड़ियों के संग उड़ी / और डाली पर बैठ गई!” सतिंदर गिल “जब उलझे जीवन के धागे / खुद ही सब सुलझाए हमने / जब जग ने प्रपंच दिखाए / सद्गुण सहज बचाए हमने!” करीना मदान ने कविता: “घर वापसी” डॉ. शिप्रा सागर ने “ग़ज़ल – देश के दंगों और आतंकवाद पर।” डॉ. अशोक वढेरा ने “मेरा गांव / अब गांव / नहीं रहा, / वो तो बस / शहर हो चला है!” अश्वनी मल्होत्रा ‘भीम’ “हंसी का कोई क, ख, ग नहीं है!” डॉ. रोनिका वढेरा ने “मासूम सा चेहरा देखा था जब / बह रहा था आसूंओं का सैलाब तब!” आर के सौंध “जो दिल में है तेरे, लबों पर आ ही जाए तो अच्छा है; / मेरे दिल में भी कई वहम है, निकल ही जाऐं तो अच्छा है!” नवनीत बक्शी “फिर से कुछ लिखो तो सही / बचपन में तो बहुत कुछ लिख कर दिखाते थे / स्कूल से लौट, बस्ता रख, दौड़े चले आते थे!” अलका कांसरा ने “जीवन है उमंग है / प्यार है मिलन है / आओ ज़िंदगी का जश्न मनाएं!” डॉ. नवीन गुप्ता ने “किसी को नहीं सुनाया जो, तेरा ज़िक्र उसी किस्से में रखा है, / तेरी सारी यादों को हमने सीने के बाएँ हिस्से में रखा है!” कहानी और व्यंग्य का दौर: गोष्ठी में डॉ. विमल कालिया ने संजीदा कहानी “प्रेम दासी-मीराबाई” को एनिमेटेड ढंग से प्रस्तुत किया। डॉ. सारिका धूपड़ ने कहानी “छुप गए हो तुम कहाँ?” को खूबसूरत अंदाज़ में सुनाया, और अश्वनी भीम ने अपने दिलचस्प व्यंग्य “जंगल में नाचा मोर” का पाठ किया। इस कार्यक्रम में डॉ पारस, डॉ तिलक सेठी, सुरिंदर पाल, अपूर्वा रवि सौंध, डॉ सत्यभामा , शैलेन्द्र प्रसाद और सीमा गुप्ता ने भी भाग लिया। यह भव्य आयोजन एक साथ कहानी के यथार्थ और कविता के भावलोक को प्रस्तुत करने में सफल रहा।

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