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अभिव्यक्ति की मासिक साहित्यिक गोष्ठी/ विजय कपूर

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 16 August:
अभिव्यक्ति की मासिक साहित्यिक गोष्ठी/ विजय कपूर
कवि अपने समय और समाज के प्रति कितना सचेत है, उसकी बेहतरीन झलक अभिव्यक्ति की मासिक गोष्ठी में देखने को मिली। सूक्ष्म संवेदनाओं का रचना संसार परिलक्षित हुआ। कविता और कहानी के माध्यम से जीवन की अनेक परतों से हो गुजरने का मौका था यह। अभिव्यक्ति ने अपने लंबे सफ़र में अनेक नामवर कहानीकार, कवि, उपन्यासकार, व्यंग्य और संस्मरण लेखक साहित्य को दिए।
अगस्त माह की गोष्ठी का संयोजन और संचालन साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया। गोष्ठी की मेजबानी कवियत्री और कहानीकार सीमा गुप्ता ने की। यह कार्यक्रम अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था और सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी की मिलिजुली प्रस्तुति थी। इस गोष्ठी में सारिका धूपड ने काँटों को भी अपनी दास्ताँ सुनानी है/ इनकी भी गज़ब प्रेम कहानी है/ इनकी मोहब्बत चिरस्थायी है/ ये बात डंके की चोट पर सबको बतानी है।
विजय कपूर ने वो उसके मन में होता तो दुःख क्यों होता/ दरअसल दुःख के मन में ईश्वरीय कुछ नहीं है/ सिवा उसकी प्रार्थना के। कृष्णा गोयल ने इंसान सबसे सस्ता मोहब्बत के नाम पर बिकता है/ और इंसान को सबसे महंगी मोहब्बत ही पड़ती है। सीमा गुप्ता ने होने से क्या हासिल न होने से क्या गंवाया/ बहुत से प्रश्न अपनी ही परछाईं को पकड़ते हैं।
हरमन रेखी ने द थिंग अबाउट ग्रीफ इज दैट ईट इज नॉट एक्सक्लूसिव/ ईट कंज्यूमज लाइफ। बी बी शर्मा ने उनके दिल में ना कोई जगह मिली/ साफगोई की बस यही सज़ा मिली। वीणा सेठी ने आईने में झाँका तोह पाया/ अलग ही अक्स मुझे नजर आया। जरीना नग्मी ने खिड़की खोल के देखा/ बादल खुल के बरस रहे हैं।
डॉक्टर नवीन गुप्ता ने जिंदगी भर की कमाई मेरे साथ ही चली जाएगी/ बच्चे मेरी ग़लतियां दोहरा कर सीखाना चाहते हैं। दर्शना सुभाष पाहवा ने याद रख,अनादर होने पर भी निभा भाव उस से/ तुम्हारा प्रेम और भी हो जाएगा, पवित्र और पुष्ट। परमिंदर सोनी ने ऊपर देख, लगातार अनुनय हूँ करती आ, अपनी धरा को देख, क्या पीड़ा है सहती। रेखा मित्तल ने “बहनें अद्भुत होती हैं।” दास दविंदर मरहम ने एक पर्दा ढूँढ रहा हूँ कहीं मिल ही नहीं रहा गुम हो गया लगता है/ तुमने कहीं देखा क्या?
डॉक्टर निर्मल सूद ने गाँव अब कहाँ रह गए गाँव/ शहर हो गए हैं/ गाँव व क़स्बे से जो भी शहर जाता/ जेब में एक टुकड़ा शहर भर लाता/
सारे गाँव में बँट जाता/ आर के सुखन ने  जब तू नहीं तो फिर क्यूं तेरा ख़्याल आए/ मुझको अज़ीज़ हैं मिरी तन्हाइयों के साये। डॉक्टर विमल कालिया ने शहर कैसे निगलेगा/ इतने सारे सूखे से इन्सान/ जो छोड़ आये हैं, गांव की नमी पीछे अपने। रजनीश कुमार ने उसी रफ़्तार से चलती है गाड़ी/ तुम्हारे प्यार से चलती है गाड़ी।
जपीता रेखी ने दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख/ मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख का नाटकीय पाठ कर सभी को मंत्र मुग्ध किया। अमरजीत अमर ने बेघरों के तुम कभी नजदीक जाकर देखना/ उनकी आंखों में बसा तूफान का दर देखना। राजिंदर सराओ सिसकती रही रात/ रात के आगोश में/ बस यूंही रात-रात भर। रिसते रहे जख्म किसी के रात/ बस यूं ही रात-रात भर। डा रोमिका वडेरा  ने बहुत दिन हुए कुछ लिखना चाहती थी, जैसी सारगर्भित रचनाओं का पाठ किया।
गोष्ठी के दूसरे सत्र में कहानियां का सुंदर संसार सामने आया। डा अशोक वडेरा ने सुंदर कहानी खिड़की वाली सीट को पढ़ा। वीणा सेठी ने दिलचस्प कहानी पत्थरों का शहर को पढ़ा। उषा पांडे गोष्ठी के लिए कहानी  “एक अंजुरी मोगरा।” विमल कालिया ने अपनी संजीदा कहानी मैं, विप्लव को पढ़ा। सुभाष भाषा ने सुंदर कहानी छेदी लाल का पाठ किया। इनके अतिरिक्त सरिता मलिक, डॉक्टर दलजीत कौर, डॉक्टर तिलक राज, नृपोदय्य रत्न, राजेश पंकज, आस्था गुप्ता, डॉक्टर सुरिंदर पाल और सुरिंदर कुमार ने भी रचनाएं पढ़ीं। कार्यक्रम में लाइब्रेरियन डॉक्टर नीज़ा सिंह, पिंकी भी उपस्थित रहीं।

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