Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 22 July:
अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का पटल/ विजय कपूर
बेगम इकबाल बानो फाउंडेशन ने सेन्ट्रल स्टेट लाइब्रेरी के सहयोग से चौथे लिखित पोएटिका कार्यक्रम का आयोजन लाइब्रेरी के सभागार में किया। इसकी अध्यक्षता जानी मानी कवयित्री प्रोफेसर गुरदीप गुल धीर ने की। इरशाद कामिल के भाई सलीम अख्तर कार्यक्रम में विशेष मेहमान के तौर पर शामिल हुए। लाइबेरियन सुनील भी उपस्थित रहे। फाउंडेशन के डायरेक्टर विजय कपूर ने कार्यक्रम का संचालन किया।


सलीम अख़्तर ने अपने वक्तव्य में कहा “बॉलीवुड के मशहूर गीतकार इरशाद कामिल की मां की याद में बनाई गई इस फाउंडेशन का उद्देश्य भारत के युवाओं को साहित्य, कला और संस्कृति से जोड़ना है। शिक्षा और महिलाओं के उत्थान के क्षेत्र में भी फाउंडेशन काम कर रही है।” कलात्मक सृजन की अभिव्यक्ति लिए 20 कवियों/शायरों के इस समागम में काव्य की अनेक विधाएं सुनने को मिलीं जो निश्छल चिंतन को दर्शाती हैं।
शहला जावेद ने, ख्वाबों के परिंदे जब उड़ते हैं/ कहां कहां घूम ठहर आते हैं। सुरजीत सुमन ने, माता पूरी हो गई सी/ हां अज माता पूरी हो गई सी/ ते मैं अधूरा। प्रोफेसर गुरदीप गुल धीर ने, जब से दिल गम से वाबस्ता हो गया ग़ज़ल तराशों से रिश्ता हो गया। गौतम शर्मा ने, बस दीवारें तकता हूं/जो भी चाहे बकता हूं। सारिका धूपड़ ने, बड़ी सिरफिरी सी है/मेरे दिल के मौसम की/हर पल बदलती तस्वीर।
मनजीत मीरा शर्मा ने, हमने आज समंदर देखा /वो भी नदी के अंदर देखा।
विजय कपूर ने, छूट की दूरी की भी सीमा होती है/ तो बंधे रहने की आस में भी फ़ैल नहीं सकते अनंत तक। सुभाष शर्मा ने, पत्नी केहंदी है/ अजकल न तुसी कविता लिखदे हो/ न ही केहंदे हो कोई कहानी। दर्शना सुभाष पाहवा ने, आ मिल किसी बहाने से/सब सूना है तेरे जाने से। डॉक्टर तिलक सेठी ने, दाम जो मांगा मिला सो इसलिए खुशहाल थे/बेचकर जायदाद पुरखों की मगर कंगाल थे। जतिन सलवान ने, पीड़ पैरी पाई झांजर/ओ वी गूंगी निकली वे/ चुप चुपीते जुल्मी पीड़ा/जोबन कई खा ले वे। डॉक्टर विनोद शर्मा ने, हो विचार ऐसे जैसी नदी का स्वच्छ पानी/सद्विचार करें हर कर्म की अगवानी।
सुखविंदर सिंह छोटे सरकार ने, वो तो इक अक्स है कोई बजूद नहीं/वो तो इक खुशबू है कोई फूल नहीं। मयंक चाहर नारी ने, बच्चों तक ना जा पाने के दुख से भरी हुई बूढ़ी, चिल्लाती है कोई गाड़ी गुज़रे डरी हुई बूढ़ी। मुस्सविर फिरोजपुरी ने, मुझे भी इश्क ने यह मोजजा दिखाया है/संवर के आए हो तुम, नूर मुझ पर आया है, जैसी लाजवाब रचनाओं का पाठ किया।
इनके अलावा सलीम अख्तर, डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया, प्रोफेसर अलका कांसरा, तरुण सेठी और अक्षय शर्मा ने भी अपनी सुंदर रचनाएं पढ़ीं। प्रोफेसर गुरदीप गुल धीर ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा “आज के माहौल मे शायर और कलाकार एक अहम तरीन किरदार निभाते हैं ।यह माशरे की ज़हनियत को खूबसूरती और अहसास की तरफ मोड़ते हैं।” लाइब्रेरियन सुनील ने सभी का धन्यवाद किया।

