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हिंदी पखवाड़े में, हिंदी पर केंद्रित अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था की मासिक गोष्ठी आयोजित की गई – विजय कपूर

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 6 September:
हिंदी पखवाड़े में, हिंदी पर केंद्रित अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था की मासिक गोष्ठी  पंजाब यूनिवर्सिटी के रेडियो स्टेशन ज्योतिर्गमय संयुक्त  तत्वावधान में स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन स्टडीज की सभागार में अभिव्यक्ति के निदेशक विजय कपूर के संयोजन और संचालन में 6 सितंबर को दुपहर 2 बजे  आयोजित की गई । कार्यक्रम की समन्वयक थीं प्रोफेसर अर्चना आर सिंह । कार्यक्रम आतिथ्य रहा रेडियो ज्योतिर्गमय की कॉर्डिनेटर डॉ भवनीत भट्टी का। इस कार्यक्रम में ट्राइसिटी के जाने-माने साहित्यकारों ने भाग लिया। डॉ सत्य भामा ने        “अपनी अपनी प्रणय  से  परिणय  सूत्र  तक  की  यात्रा।”
डॉ अर्चना आर सिंह ने “मैं जाती हूं भूल” अश्वनी मल्होत्रा “भीम” ने इन पर्दों को लगाईये  और बुरे काम हंस हंस के कर जाईये।” विजय कपूर ने “मेघमालाओं सी उमड़-घुमड़ तुम मुझ पर ही बरसती हो/ क्यों मेरे सूखेपन को  भिगोने के वास्ते तुम यूं तड़पती हो।” डॉ प्रसून प्रसाद ने “पढ़ना सांस लेना है, लिखना सांस छोड़ना।” आर के सुखन ने “मुझसे अलग हो के कहीं जाओ मुझे क्या तुम बैठ रक़ीबों संग बतियाओ मुझे क्या।” ममता ग्रोवर ने “वो अब आएँ हैं महज़ हमारी खैरियत पूछने जब हम टूट चुके हैं दर्दे- ए- दिल का इलाज करते- करते”, विमल कालिया विमल ने कविता “मैं बार बार  पढ़ता हूं तुम्हें लगता है, तुम इस बार समझ आ रही हो।” शहला जावेद ने  “क्या होती जीवनधारा सरल सम्पूर्ण जीवन विषपान अविरल तिल तिल मरता प्रतिपल फिर भी रचता संसार नित नवल।” मोनिका (मीनू) ने “राह में खुशियाँ बिछाते चलो गीत प्रेम के गाते चलो।”
डॉ निर्मल सूद ने “क्या जानते हो स्त्री की पीड़ा? विवशता,वर्जना, परायापन।” अमरजीत अमर ने “चुपके चुपके बीत रहा है यह मौसम कचनारों का यह भी शायद रंग है कोई अब की बार बहारों का।” राजिंदर सराओ ने “ऐ जिंदगी फिर से सुना ,वो कच्ची उमर की कच्ची सी कहानी, जिसमें कोई राजा नहीं था नहीं थी कोई रानी।” सीमा गुप्ता ने  “रक्त रंजित रहीं पालती पोसती रहीं गिनती से बाहर  हाशिये पर खड़ी रहीं।” अन्नू रानी ने “उदासीन है मन चाहे पर     अंधकार मत लिखने दे, नियति के हाथों से श्रम का तिरस्कार मत लिखने दे।” नीरू मित्तल ‘नीर’ ने “वह गाती थी कोयल के जैसी मीठी-सी सुलगती अंगीठी-सी पपीहे की आवाज़-सी वीणा के साज़-सी।” सुरेन्द्र सोनी काकड़ौद ने  “माँ को गाँव जाता देख शीतल पुरवाई माँ को रोकने को बार-बार लिपट रही है माँ के पैरों से और बादलों के सजल नेत्रों से
नहीं संभाले जा रहे हैं  पलकों पर अटके हुए भारी आँसू।” डॉ. नवीन गुप्ता “रिश्तों  में कुछ  फर्क़ आने  लगा है, वो मेरी दोस्ती  आज़माने  लगा है” खुशनूर ने “जिंदगी गुज़ार दी हमने उसके लिए/ जिसे पास से गुज़रने का इल्म भी न था।”
हरमन रेखी ने “सब बह गया। बस अकेला मैं रह गया।” रविंदर टंडन ने  “कविता तो हमेशा रहती है हर वक्त, हर जगह, कभी उनमुक्त कभी शर्माई सी” डॉ सुनीत मदान ने “बाहर पूर्ण चाँद है, किन्तु भीतर मेरे एक गहराता, सन्न अँधेरा और चुप्पी” आर के सौंध ने “तेरा प्यार तेरी आंखों तक महदूद है, तेरे वादे तेरी बातों तक महदूद है क्या करेगा वादा तू जन्मों तक निभाने का, तेरी जिन्दगी तेरी सांसों तक महदूद है।” कुलतारन छतवाल ने “ये कामवालीयाँ लोहे की बनी हैं।” जैसी सारगर्भित कविताओं का पाठ किया। गोष्ठी के दूसरे सत्र में  डॉ अर्चना आर सिंह ने अपनी दिलचस्प कहानी” गिलहरी का तोहफा” का बहुत सुंदर पाठ किया। डॉ विमल कालिया विमल ने एनीमेटेड स्टाइल में संजीदा कहानी ” चाचा विशेषी लाल ” पढ़ी। अश्वनी भीम ने ” भोलू जी और समाज हित प्रवर्तक” नाम का व्यंग्य पढ़ा। डॉ जसबीर चावला, सतिंदर गिल ने भी गोष्ठी में भाग लिया।

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