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अभिव्यक्ति की गोष्ठी में डॉ राजिंदर कुमार कन्नौजिया के नवीन काव्य-संग्रह “मेरी प्रिय कहानियां” का विमोचन – विजय कपूर

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 2 November:
अभिव्यक्ति की नवंबर माह की साहित्यिक गोष्ठी में डॉ राजिंदर कुमार कन्नौजिया के नवीन कहानी संग्रह “मेरी प्रिय कहानियां” का विमोचन सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी के सहयोग से उनकी सभागार में साहित्यकार रतनचंद रत्नेश द्वारा उनकी अध्यक्षता में हुआ। कार्यक्रम का संचालन अभिव्यक्ति के अध्यक्ष, साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया।
इस कार्यक्रम में साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ अश्वनी शांडिल्य ने अपनी टिप्पणी में कहा: “डॉ राजेन्द्र कुमार कनौजिया ने अपने  संग्रह ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ में समाज, समय तथा व्यक्ति में आ रहे अवांछनीय परिवर्तनों को लेखक ने सुविधा, भौतिक वैभव, सुख तथा नैतिकता की तुला पर तोलकर पाठकों के सम्मुख रखा है।
साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने अपनी समालोचना में कहा “डॉ राजिंदर कुमार कन्नौजिया की कहानियाँ व्यवहारिक हस्तक्षेप का एक विश्वसनीय हिस्सा हैं, जो सामाजिक कौशल सिखाने और चिंता कम करने में सहायक सिद्ध होंगी।” साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ दलजीत कौर ने अपनी समीक्षा में कहा, “डॉ० राजेंद्र कुमार कनौजिया के नए कहानी -संग्रह (मेरी प्रिय कहानियाँ) की कहानियाँ सर्व गुण संपन्न है। संग्रह में भाषा सरलता से मूल संवेदना को व्यक्त करती है। रोचकता कहानियों का सशक्त गुण है जो कहानी के अंत तक बनी रहती है।” डॉ राजिंदर कुमार कन्नौजिया ने अपनी पुस्तक पर बात रखते हुए कहा “मेरी इन कहानियाँ से पाठकों को अपने परिवेश में किसी खिड़की के खुल जाने और एक नई दुनिया के सामने आ जाने की उम्मीद जैसा लगेगा।” कार्यक्रम के अध्यक्ष जाने-माने कवि और कहानीकार रतन चंद रत्नेश ने अपने भाषण कहा “अतीत की आहटें, वर्तमान का अहसास और भविष्य की आशंकाओं को दर्शाती हैं, डॉ राजिंदर कुमार कन्नोजिया की कहानियां।”
इस कहानी संग्रह “मेरी प्रिय कहानियां” का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है बल्कि संवेदनशीलता बढ़ाना और रूढ़ियों को तोड़ते हुए सकारात्मकता को पैदा करना है, क्योंकि कहानियों में समाज को बदलने की शक्ति होती है। यह पुस्तक समाज में एक स्वस्थ और आवश्यक बातचीत को बढ़ावा देगी। साहित्यिक गोष्ठी के दूसरे सत्र में समकालीन जीवन के विविध रंगों का काव्य-चित्रण देखने को मिला। आयोजित भव्य साहित्यिक गोष्ठी में ट्राइसिटी के प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से समकालीन जीवन की गहरी अनुभूतियों और विविध आयामों को वाणी दी। यह गोष्ठी कविता के सौंदर्य, चिंतन की गहराई और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत संगम बनी। कवियों ने शहरीकरण, प्रकृति प्रेम, स्त्री-पुरुष संबंध, जीवन-दर्शन और मानवीय मूल्यों जैसे महत्वपूर्ण विषयों को केंद्र में रखा।
डॉ राजिंदर कन्नौजिया की कविता में महानगर में अकेलेपन और गाँव के प्रति गहरे लगाव का मार्मिक चित्रण है। उनका गाँव एक हाँफता हुआ प्राणी है, जो ‘बौना बनकर रहने’ की मजबूरी को समझता है। यह कविता शहरीकरण के दर्द और विस्थापन की पीड़ा को दर्शाती है। विजय कपूर ने जल संकट को मानवता से जोड़ा है, ‘पानी के हाहाकार’ से अपरिचित न रहने की चेतावनी देकर एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक सरोकार को प्रस्तुत किया। डॉ दलजीत की ‘चुरा ली गईं कविताएँ’ रचना-कर्म की पवित्रता और मौलिकता की वापसी की आकांक्षा व्यक्त करती है, जो साहित्यिक चोरी या विचारों के भ्रष्ट होने पर एक टिप्पणी हो सकती है। डॉ अश्वनी शांडिल्य की कविता में वियोग का गहरा भावनात्मक स्पर्श है, जिसमें ‘बिन तुम्हारे घर सूना है’ की उदासी और परछाई ढूंढने की छटपटाहट है। रतन चंद रत्नेश ने अपनी सहकर्मी कवयित्रियों की रचनाशीलता को ‘सुबह की मंद मंद हवा’ और ‘शाम के ढलते सूरज’ के रूप में प्राकृतिक उपमानों से महिमामंडित किया।
ममता ग्रोवर की रचना भी इसी विषय को आगे बढ़ाती है, जहाँ ‘सड़क’ बेटों को नगर और महानगर ले जाती है, जो आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ और परिवार से अलगाव को रेखांकित करता है। आर के सुखन की कविता में घर की ‘दर-ओ-दीवार’ का मूक संवाद भी जाने वाले के प्रति चिंता और प्रेम को दर्शाता है। नौमिका शर्मा ने अपनी कविता में प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया। ‘धरती का श्रृंगार पेड़ हैं’ जैसी पंक्तियाँ पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक सौंदर्य की सरल लेकिन सशक्त अभिव्यक्ति हैं। निर्मल सूद ‘नदी होना’ चाहती हैं, जो गतिशीलता, निरंतरता और निर्मलता के साथ जीने की इच्छा को व्यक्त करता है। सतिंदर कौर की कविता ‘पुरुष स्त्री समान विदा नहीं हुआ’ पुरुषसत्तात्मक समाज की रूढ़ियों पर प्रश्नचिह्न लगाती है और स्त्री के त्याग व विस्थापन की भावना को सामने लाती है। नीरू मित्तल की कविता में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श पर एक समकालीन प्रश्न उठाया गया है, जो आज के पुरुष से मर्यादा और आदर्श के बीच संतुलन स्थापित करने की अपेक्षा रखता है। नवनीत बक्शी की पंक्तियाँ ‘चाह नहीं जाती’ जीवन की अतृप्ति, निरंतर खोज और इच्छाओं के अंतहीन सफर को दार्शनिक अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं। शहला जावेद ने ‘आईने और बशर’ के माध्यम से टूटने और बिखरने के बाद स्वयं को संभाल लेने या न संभाल पाने के मानवीय स्वभाव और अस्तित्ववादी द्वंद्व को दर्शाया है। अलका कांसरा ने ‘जीवन है उमंग है’ कहकर जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और उत्सवधर्मी भावना को प्रेरित किया है।
खुशनूर कौर की रचना में मातृत्व की गहरी अनुभूति है, जहाँ ‘इंसान होना’ बच्चे को जन्म देने के बाद ही पूर्ण होने का बोध कराता है। रश्मि शर्मा ने ‘आँख की नदी’ और ‘नमकपारा’ जैसे बिम्बों का प्रयोग कर जीवन के खारे-मीठे स्वाद को व्यक्त किया है। रजनी पाठक ने चाय की ‘तलब’ को एक सहज मानवीय आनंद के रूप में प्रस्तुत किया। रेखा मित्तल की कविता में ‘तुमसे मिलना’ एक अद्भुत संयोग के रूप में चित्रित है, जो जीवन में निमित्त और संयोग के महत्व को दर्शाती है। इस गोष्ठी की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता की विविधता, भाषाई सरलता और विषयों की व्यापकता का प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त आर के सौंध, अपूर्वा रवि सौंध, अनुरानी शर्मा, ललिता पुरी, मंजू खोसला, डॉ अनीता सुरभि, राजेश आत्रेय, मुस्सविर फिरोजपुरी, हर्ष कन्नौजिया, डॉ नीना  कन्नौजिया, सुखचैन सिंह भंडारी, अमृत सोनी, सुरिंदर कुमार सोई, नरेश , राजेश दीपक, दीपक शर्मा चनार्थल , डॉ नवीन गुप्ता ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक ओर जहाँ व्यक्तिगत अनुभूतियों को गहराई से अभिव्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभाई। यह गोष्ठी निश्चित रूप से साहित्य प्रेमियों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रही।
विजय कपूर, अध्यक्ष, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, चंडीगढ़।

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