Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 4 April:
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी और सृष्टि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में वरिष्ठ रचनाकार बृज भूषण शर्मा के नूतन काव्य-संग्रह “शबनम की बूंदें” का भव्य लोकार्पण समारोह लाइब्रेरी के सभागार में संपन्न हुआ। अभिव्यक्ति के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर के कुशल सान्निध्य में आयोजित इस सारस्वत उत्सव की मेजबानी स्वयं रचनाकार बृज भूषण शर्मा ने की। पुस्तक पर गंभीर विमर्श करते हुए प्रख्यात साहित्यकार कुमार शर्मा ‘अनिल’ ने कहा कि इन कविताओं का मूल स्वर सामाजिक विरोधाभासों और विद्रूपताओं के विरुद्ध सहृदयता के पक्ष में खड़ी एक सशक्त आवाज है। संस्था के अध्यक्ष, वरिष्ठ साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने इसे मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विसंगतियों और आत्म-चिंतन का अद्भुत संगम बताया। साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ. निर्मल सूद ने कृति को रेखांकित करते हुए कहा कि “शबनम की बूंदें” प्रकृति के बदलते स्वरूप और मानवीय संवेदनाओं का एक संवेदनशील दस्तावेज़ है।


अपने सृजन पर प्रकाश डालते हुए बृज भूषण शर्मा ने कहा, “यह संग्रह दुनियादारी, रिश्तों और जीवन के उतार-चढ़ाव के अनुभवों से स्वयं को समझने और समझाने का एक विनम्र प्रयास है।” लोकार्पण के पश्चात आयोजित काव्य-गोष्ठी में उपस्थित कवियों ने अपनी लेखनी से विमोचित कृति के भावों को और विस्तार दिया: आर. के. सुखन ने “मिरे गिरने पे हंस रहे हैं वो / बयां ख़ुद को यूं कर रहे हैं वो।” विजय कपूर ने “प्रेम कोई ठहरा हुआ सरोवर नहीं/ वह तो मरुस्थल में फूटता हुआ शीतल निर्झर है जो चट्टानों का सीना चीरकर कहता है, मैं हूँ, और मैं रहूँगा।” बृज भूषण शर्मा ने “बुरा वक्त जब पुकार कर निकले/ निःसंदेह हमें निखार करने के लिए।” डॉ. विमल कालिया विमल ने “ज़रूर एक दिन फटा पजामा फैशन कहलायेगा/ और साबुत कपड़ों वाला जाहिल बुलाया जाएगा।” अश्वनी मल्होत्रा ने ‘भीम’ “चौराहे पर ट्रैफिक में अड़ा था/ ठेलेवाला मूंगफली लिए खड़ा था।” कुमार शर्मा “अनिल” ने “कैद होते ही फिर खो क्यों देते हो अपनी अमूल्यता, मीठापन/ कहलाते ही मिनरल?”
नीरू मित्तल नीर ने “बारूद की गंध बिखरी हवाओं में/ आसमान लाल भभक रहा है हरसू युद्ध छाया है।” रेखा मित्तल ने “महज़ लकड़ी की कुर्सी नहीं/ विस्थापित जंगल हैं यह।” नारायण भदौरिया नवल ने “समय प्रतिकूल हो धीरज मगर खोया नहीं जाता / सपना साकार करना हो तो फिर सोया नहीं जाता।” शिप्रा श्रीवास्तव सागर ने “आदमी आज भी कहां आजाद है / बदल रहा बस तख़्त का सैयाद है।” पवन शर्मा मुसाफिर ने “प्रणय को विरहाग्नि में कोई दीवाना तो सेके / निहारे आइना सबको कोई उसको भी तो देखे।” स्वाति शर्मा परिंदा ने “बन जा परिंदों की तरह/ भर ले कामयाबी की उड़ान।” नवनीत बक्शी ने “मंच के संचालक ने कहा तीन मिनट का समय ही है आप के पास/ और आप का समय शुरू होता है अब।” राजिंदर सराओ ने “कोई इश्क दी सूली चढ़ गया / कोई विच दरिया दे डुब मोया।” प्रतिभा सिंह ने “बात मैं कैसे करूं जब, तुम यहाँ होते नहीं / साथ रहते हो मगर, क्यों साथ में होते नहीं?” अमरजीत अमर ने “बेघरों के तुम कभी नज़दीक जा कर देखना/ उनकी आँखों में बसा तूफ़ान का डर देखना।” ममता ग्रोवर”प्रेम से चलती जब गाड़ी/ नफरतों से याराना क्यूँ।” डॉ. तिलक सेठी ने “चीजों को मैं हाथ लगाकर क्या करता/ दाम मेरी औकात से ज्यादा लिखा था।” डॉ. निर्मल सूद ने “साँझ की देहरी पर रात उतरने से पहले/ जब क्षितिज पिघल कर रंग बिखेरे।” कुसुम धीमान कलिका ने “याद माता तात श्री हर रोज करते हैं/ लौट आओगे अभी घर आस धरते हैं।” कृष्णा गोयल ने “जो दूसरों की बुराई कर रहा है / नफरत की भरपाई कर रहा है।” अलका कांसरा ने “तुम आए मेरे जीवन में मैंने कहा आया सूरज/ तुम फैल गए बन सुनहरी धूप।” परमिंदर सोनी ने “ढीठ हूॅं, मस्त रहती हूॅं, सभी कहते हैं/ बेबाक, बिंदास, भी, सभी समझते हैं।” अनुरानी शर्मा ने “वो क्या है/ जो वक्त के सिरहाने पड़ा है?” आर. के. सौंध ने “रिश्तों में नज़दीकीयां भी अजीब होती जा रही हैं/ सब्र घटता जा रहा है, कशमकश बढ़ती जा रही है” जैसी सारगर्भित कविताओं के साथ गोष्ठी की गरिमा को बढ़ाया। कार्यक्रम के दूसरे चरण में डॉ. विमल कालिया विमल ने अपनी कहानी “सब मोह माया है” का एनिमेटेड पाठ कर तकनीकी और सृजन का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। वहीं, अश्वनी भीम ने अपने दिलचस्प व्यंग्य “जंगल में मोर नाचा” के माध्यम से व्यवस्था पर करारा प्रहार किया। इस गरिमामयी अवसर पर सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी की लाइब्रेरियन
डॉ. निज़ा सिंह ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

