अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था की मासिक गोष्ठी में डॉक्टर विमल कालिया के कहानी संग्रह “अर्धनारीश्वर … खामोशी का संवाद” का विमोचन और परिचर्चा
Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 3 August:
चंडीगढ़ की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति की मासिक गोष्ठी में कहानीकार और कवि डॉक्टर विमल कालिया के तीसरे कहानी
संग्रह “अर्धनारीश्वर … खामोशी का संवाद” का विमोचन और उस पर जाने माने साहित्यकारों ने चंडीगढ़ प्रेस क्लब में परिचर्चा की। सोलह कहानियों की इस पुस्तक को सृष्टि प्रकाशन चंडीगढ़ ने छापा है। साहित्यकार और रंगकर्मी डॉक्टर कैलाश ने अपनी समालोचना में कहा “ये कहानियां निसंदेह यथार्थ और कल्पना की प्रयोगात्मक कहानियां हैं। इन्हें किसी परम्परा से जोड़ना सही नहीं होगा।”
साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने टिप्पणी करते हुए कहा। डॉक्टर विमल कालिया विमल की कहानियों की शैली वर्णात्मक और संवादात्मक है। कथावस्तू की लय में चरित्रों के साथ धारा प्रवाह बहती हैं। जीवन के अनेक पहलुओं और जटिलताओं को इन्होंने बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया है।”


साहित्यकार और प्रोफेसर डॉक्टर पंकज मालवीय ने अपनी बात रखते हुए कहा “कहानी काल्पनिक होती है और यदि इस कल्पना में पाठकों का जुड़ाव होता है तो यह जुड़ाव यथार्थ होता है। यही जुड़ाव हमें डॉक्टर कालिया की रचनाओं मिलता है।” साहित्यकार और प्रोफेसर डॉक्टर प्रसून प्रसाद का कहना था “विमल एक कुशल कथा-शिल्पी की तरह अपने शिल्प को ऐसे गढ़ते हैं जैसे वह कथा न हो,नाटक के अंक या दृश्य हों। शिल्प की गठनशीलता की दृष्टि से विमल कालिया का यह संग्रह निस्संदेह पठन और सुखद अनुभूति की अनिवार्यता रखता है।”
साहित्यकार और पत्रकार बलवंत तक्षक ने अपने पर्चे में कहा “विमल कालिया की कहानियां उनकी संजीदगी का दर्शन है जो हमारे मानस को झकझोड़ता है।” साहित्यकार और प्रकाशक विजय सोदई ने अपने वक्तव्य में कहा “डॉक्टर विमल की कहानियां नदी के प्रवाह-सी आपको खुद मे समेटे कल-कल का मधुर राग आपके कानों में घोलती हुई अचंभित और आनंदित करती हैं। विमल कालिया ने अपनी साहित्यिक यात्रा का वर्णन करते हुए कहा “कहानियां, यथार्थ और कल्पना के पलने में शब्दों संग पलती और बढ़ती हुई पाठकों के दिलोदिमाग पर छा जाने का माद्दा रखती हैं।”
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कविताओं का बोलबाला रहा। डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया ने प्रेषित कर रहा हूं फिलहाल/ केवल यह विश्वास/कि सितारों के आगे / जहां और भी है, विजय कपूर ने इतना मुश्किल मैंने कोई वादा नहीं किया था/ तुम्हारे न होने पर भी खुद को आधा नहीं किया था, अलका कांसरा ने सागर का किनारा अनंत और क्षितिज का मिलन। सत्यवती आचार्य ने झीनी चादर, झीना बाना, उलझ न जाए, ताना-बाना, वीना सेठी ने कल मैंने एक सपना देखा, सपने में कोई अपना देखा, जिसका टूटा सपना देखा, दर्शना सुभाष पाहवा ने सूनी नहीं रहे गई भाई की कलाई, डिबिया में प्यार, छुपा कर लाई बिटिया, मोनिका कटारिया ने सोचती हूँ खोल दूँ मन की तहें या ख़ामोश रहूँ ख़ामोश रही तो लोग क़यास लगायेंगें।
सुरेंद्र बंसल ने हमारे क़त्ल का उनसे गिला न करना था/ ज़रा सी बात पे यूं दिल बुरा न करना था, डॉक्टर निर्मल सूद ने कलम हूँ मैं मन चाहा लिखती हूँ/ तलवार की धार सी पैनी शहद की मिठास सी लिखती हूं, जरीना नगमी ने कौन यहां आया होगा/ किसने मुझे बुलाया होगा, रेखा मित्तल ने हाँ, मैं एक गृहणी हूँ सबको बहुत गर्व से बताती हूँ, शहला जावेद ने जीवन को कुछ यूँ आकार दो/ सपने सब नहीं पर कुछ तो साकार हों, अश्वनी भीम ने अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं मैं/ क्योंकि आज भी चांद में परियां नजर मुझे आती हैं/ शरारतें बचपन की आज भी मुझे भाती हैं, सीमा गुप्ता ने मगर तुम क्यों ना हुई कठोर माँ/ तुम क्यों रही इतनी समर्पित माँ।
बलवंत तक्षक ने वादा खिलाफी के लिए माफी/ चालीस साल बाद लगा रहा हूं तुम्हारे पत्रों की प्रदर्शनी/ ताकि समझ सकें प्यार के सही अर्थ, डॉक्टर प्रसून प्रसाद ने इसी इंतज़ार में गुज़र जाती हैं सदियाँ/उस एक का/जो तुम्हें कहीं रखकर भूल गया, कृष्ण गोयल ने आजादी के जश्न पर पड़ा गम का साया था हुए कत्लेआम देश का बटवारा कराया था, अन्नूरानी शर्मा ने कतरा कतरा जीते रहना कितना मुश्किल होता है? ज़हर गमों का पीते रहना कितना मुश्किल होता है, सुभाष भास्कर ने सभी भाषाएं सुंदर हैं और सब ही हैं अनमोल मधुर भाषाओं का मिलकर सब आदर करें दिल खोल, सुभाष शर्मा ने मित्र तूं एदा उदास न होय कर, डॉक्टर सुनीत मदान ने रिश्तों के ताने-बाने बुनते-बुनते मैं कहीं खुद ही न उधड़ जाऊं।
सतिंदर गिल ने बहुत लोग प्रशंसा भी ताने मारकर करते हैं व्यक्ति के गुणों का बखान कई बातें सुनाकर करते हैं इसके अतिरिक्त,डॉक्टर सपना मल्होत्रा सारिका धूपड, शीनू वालिया, विनोद कश्यप, डॉक्टर कर्म चंद, डॉक्टर दलजीत कौर, डॉक्टर राजवंती मान,रजनीश कुमार, गौतम शर्मा , नलिनी चक्रवर्ती,रीना मदान राजिंदर सराओ, दस दविंदर महरम और देवेंद्र सैनी ने भी कविताएं पढ़ीं। डॉक्टर रेवा ऋषि ने खास तौर पर कार्यक्रम में भाग लिया।
साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर

