अभिव्यक्ति की मासिक गोष्ठी में डॉक्टर निर्मल सूद के काव्य-संग्रह “शब्दों के परिंदे” का विमोचन हुआ
Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 8 October:
अभिव्यक्ति की अक्टूबर माह की गोष्ठी में कवियत्री डॉक्टर निर्मल सूद के काव्य संग्रह शब्दों के परिंदे का विमोचन सृष्टि प्रकाशन के सहयोग से हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन और संचालन साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया। विमोचन के उपरांत पुस्तक पर साहित्यकारों ने अपनी अपनी समालोचनाएं पढ़ीं। डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया ने अपनी टिप्पणी में कहा डॉक्टर निर्मल सूद की कविताएं सुगम और सरल हैं। इनका सौंदर्य बोध देहाती मिट्टी से निर्मित हुआ है जो कविताओं में उनके स्वभाव सा मिश्रित है।


विजय कपूर ने अपनी समालोचना में कहा “डॉक्टर निर्मल सूद ने अपनी रचनाओं में जो मानवीय कथ्य गढ़ा है वो खूबसूरत भाषा के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली रूप लिए समाज को परखता हुआ सामने आता है।” डॉक्टर सपना मल्होत्रा ने अपनी टिप्पणी में कहा “शब्दों के परिन्दे” सामाजिक सरोकार और मानवीय अनुभूतियों का दस्तावेज़ है। डाॅ निर्मल की कविताओं में करूणा की एक अविरल धारा बहती है जो मानव और मानवता को बचाने की बात करती है।”
बलवंत तक्षक ने कहा ” डॉक्टर निर्मल सूद की कविताएं सूक्ष्म अनुभूतियों के साथ सामाजिक संवेदनाओं को खंगालती हैं। साहित्यकार और प्रकाशक विजय सोदाई ने संग्रह की कविताओं को अनुभव से उपजी रचनाएं बताया। डॉक्टर निर्मल सूद ने अपने वक्तव्य में कहा “शब्दों के परिन्दे“ यह मेरा पहला एकल काव्य-संग्रह है।इसमें जीवन के विविध भावों के रंग उकेरे गए हैं जैसे-सुख-दुख, आँसू-हास्य,आशा-निराशा आदि। समस्त मानवीय भावों को शब्दों में पिरोने का प्रयास किया गया है। प्रकृति के अनमोल उपहार, जीवन के प्यारे रिश्तों व बीते दिनों की यादों को सदाबहार रखने की कोशिश कविताओं के माध्यम से की है। उन्मुक्त, स्वच्छंद उड़ान भरने के लिए शब्द परिन्दों को खुला आकाश दिया गया है।
कार्यक्रम के दूसरे चरण में अभिव्यक्ति से जुड़े साहित्यकारों ने अपनी अपनी काव्य रचनाएं पढ़ीं। डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया ने मैं हूं तो /हूं कहीं/गुमनाम सही, विजय कपूर ने बेनकाब होने से पहले /चेतावनी की शंखध्वनि नहीं होती/ कुछ ने बहना होता है/ कुछ ने रुक कर सहना होता है, बलवंत तक्षक ने मैने पूछा/कितना काम करती हो तुम/ कभी थकती नहीं, ऊषा पांडे ने दिल के जख्मों को भुलाने का हुनर हम जानते हैं/ वक्त बिगड़ा जो बनाने का हुनर हम जानते हैं, रेखा मित्तल ने स्त्रियाँ बहुत अच्छी रफूगर होती है/ सिलती है रोज रिश्तों में हुए सुराखों को,
सीमा गुप्ता ने जोगी, जोगन जोग की बातें करते हैं/ बस्ती बस्ती, शहर, जंगल जंगल कुछ शैदाई होते हैं, परमिंदर सोनी ने जीवन तेरी देन/ ऋणी तेरे हैं दाता/ तू है बख्शनहार/ गुणों की खान विधाता, रजनी पाठक ने मैं हूँ कन्या भारत की/ देवी का स्थान मैं पाती हूं/ पर पता नहीं क्यों/ समय आने पर बलि चढ़ा दी जाती हूँ, निम्मी वशिष्ठ ने नीं माए मेरा चित्त करदा/ मैं पंछी बन जावां/ नीं थाओं थाईं जा के मां/ सुख सुनेहे पहुँचावां, दास देवेंद्र मरहम ने इंसानियत हो गई शर्मसार फिर से/ हैवानियत का हुआ है वार फिर से/ डॉक्टर अशोक वढेरा ने कुछ पचपन से कम की तुम/ थोड़ा पचास से ऊपर का मैं, जरीना नगमी ने इक अनबने शहर की तलाश है, डॉक्टर प्रसून प्रसाद ने प्रेम एक दूसरे की सफलता का जश्न है/स्थिरता,सुरक्षा और आत्मीयता ही लक्ष्य है।/यहाँ असहज पलों में भी सहजता है/फैसले की चिंता में घुले बग़ैर/यहाँ हर कोई करता है। शहला जावेद ने घर में भीतर भी देखा / बाज़ार में बाहर भी देखा/ नारी के लिए दोनो पर खींची है समाज ने लक्ष्मण रेखा, वीना सेठी ने मेरे रब /इक नजरे करम करो मेरी लाज है तुम्हारे हाथ में, सत्यवती आचार्य ने उठो उठो मनुष्य/ प्रहरी बनो तुम देश के, डॉक्टर रोमिला वढेरा ने अगर साइकल बोल पाती तो क्या संवाद करती, अलका कांसरा ने समय की पगडंडी पर मिले कितने ही लम्हे/ वे बचपन के
बेफिक्र लम्हे/ वो जवानी के शोख़ लम्हे, डॉक्टर सत्यभामा ने मध्य वर्ग की पीड़ा का बीड़ा, सारिका धूपड ने सदा आबाद रहती हूँ/ तुम्हारे ख्यालों के साए में/ क्यों मुझे बर्बाद करने तुम, लौट आते हो? राजिंदर सराओ ने, सजना वे/ तेरी चुप ने बोल बोल कलेजा खा लया जैसी सारगर्भित कविताओं , नज़्मों और गजलों का पाठ किया।
दूसरे सत्र में डॉक्टर पंकज मालवीय ने खान-पान पर आधारित लघु कहानी नवाबी शौक का सुंदर पाठ किया। इनके अलावा बबिता कपूर, डॉक्टर दलजीत, सुभाष शर्मा , डॉक्टर शादी प्रभा डॉक्टर करमचंद, शीनू वालिया,मीता खन्ना, विनोद कश्यप, पाल अजनबी, डॉक्टर रेवा ऋषि ने भी गोष्ठी में भाग लिया।

