Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 6 November:
अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था ने पचासवें वर्ष की अपनी यात्रा में नवंबर माह की गोष्ठी का आयोजन कि
2024 में अभिव्यक्ति की स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो जाएंगे, जिसकी नींव स्वर्गीय डॉक्टर मेंहदीरत्ता ने 1974 में रखी थी। सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी के सहयोग से इस गोष्ठी की मेजबानी इस बार कवियत्री कृष्णा गोयल ने की। इसका आयोजन और संचालन साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया। लाइब्रेरी की सभागार में ट्राइसिटी के 35 कवियों ने अपनी खूबसूरत रचनाओं से सतरंगी सांझ को बुना।
कृष्णा गोयल ने
छोड़ो तुम आरती को
धारण करो तलवार
महिषासुर के संघार को


बहनों हो जाओ त्यार…राजेश बेनीवाल ने अहल-ए-“सुखन” सब यहां इंतज़ार में हैं
भीड़ है इस क़दर हर कोई क़तार में है, डॉक्टर विमल कालिया ने शनै शनै शाम जैसे
ढलने लगी हो.
तुम पिघलने लगी हो,
परमिंदर सोनी ने उड़दी फिरदी मलंगी चाल/मैं रखना है बचपन जिओंदा, डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया ने घोड़ा लड़की गिलहरी। लड़की रसोई में रोटियां सेंकती है/ और घोड़े पे सवार/ किसी बांकुरे जवान का/स्वप्न देखती है, विजय कपूर ने नवचिंतनजनित
अस्वीकृति की धारा के
अविरल वेग में
जो झड़ा है,
वही झड़े के साथ
खड़ा है।
अनुरानी शर्मा ने न भूल मेरे दोस्त कि तू लाजवाब है
बे-मिस्ल, बे-नज़ीर और बेहिसाब है, वीना सेठी ने फिर मिलूंगी
मैं आपको फिर मिलूंगी,
शायद एक ख्याल बनके, माथे की तकदीर बनके
मैं आपको फिर मिलूंगी,राजिंदर सराओ ने कित्थे गई सखियां ते कित्थे गए ढाननी/रल के बनाए सी जदो रेत दे मकान नी,
डॉक्टर अशोक वढेरा ने
ये दो पहिया सी जिंदगी ,
अब साइकिल जैसी लगती है,
शहला जावेद ने ज़िन्दगी के बक्से में ख़त रखे थे पुराने
आज जब खोला तो सब लगे अनजाने,
दास देवेंद्र मेहरम
तुम्हारी यादों के खत, संभाल कर रखे,
माला में मोती जैसे, पिरो कर रखे,
ऊषा पांडे ने
उमर थी कच्ची पर, देशभक्ति कूटकर,
घोल-घोल रुधिर में , पान किये वीर थे, रेखा मित्तल ने वह गुलमोहर का पेड़
हमारी अधूरी मुहब्बत का राज़दार,
दर्शना सुभाष पाहवा ने छुआ विज्ञान ने आसमां, तूं वहीं की वहीं।
कहां से लाई इतनी सहिष्णुता जैसे मही,निम्मी वशिष्ठ ने
हुंदा दिल उदास कदे जद भी लगे इऊं है कोई नेडे तेडे मेरे..बिरहडे चुभन जद वांग कंडे हौली हौली कंडे कोई कढे मेरे..मेरा गीत,
अमरजीत अमर ने
मेरी ईमानदारी की बड़ी तारीफ़ करते हैं
कहाँ से अक़्ल इतनी आ गई है बेईमानों में।
आभा मुकेश साहनी ने शब्दों से पहरा हटा दो,रेखा वर्मा ने हृदय कपाट को थपथपाया है, डॉक्टर नवीन गुप्ता ने गले वो नहीं मिलता, फैसले से मिलना हमें नहीं आता, ऑक्टर सुदेश शर्मा नूर ने मेरे बेचैन दिल को करार आ गया, दीक्षित जोशी ने पैसा ही सब कुछ हो गया है,डॉक्टर निर्मल सूद ने वक्त हूं पर नहीं बच पाता वक्त के प्रभाव से
जैसी सारगर्भित कविताओं का पाठ किया। दूसरे सत्र में डॉक्टर विमल कालिया ने रिश्तों के टूटन की कहानी दोषी कौन का सुंदर पाठ किया। अश्वनी भीम ने अपना व्यंग्य थानेदार दिवस पढ़ा और सुभाष शर्मा ने अपनी लघु कहानी लोकशाही का सुंदर पाठ किया।

