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बढ़े चलो/ सत्यवती आचार्य

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 29 November:
बढ़े चलो/ सत्यवती आचार्य
गिर गए हो गर, तो हर्ज़ ही क्या?
गिर, गिर उठना आवश्यक है
जीवन ही गिरना, उठना है
फिर, फिर उठकर तुम बढ़े चलो।
विघ्न और बाधाएँ भी हैं संगी-साथी जीवन के
धूल-धूसरित कर उन सबको
शूरवीर बन डँटे रहो
तनिक रुके बिन बढ़े चलो l
चौकन्ना रह पल-पल, प्रतिक्षण
दक्ष शत्रु की कटुता से,
ढाल, भाल सब अस्त्र-शस्त्र से सजे रहो, तैयार रहो
मातृभूमि के रक्षक हो, उद्घोष करो और बढ़े चलो।
आच्छा दित  हैं वन-उपवन
निर्झर की सुधा से यह वसुधा
वन्य जीव, मानव,  हर प्राणी
का है आश्रय यह वसुधा
वसुधा ही कुटुंब है सबका
समझो सबको समझाओ l
प्राणि मात्र की रक्षा का प्रण
लेकर आगे बढ़े चलो।
सृष्टि-सृजन में सर्वश्रेष्ठ है
मानव का यह जन्म विशेष
दुर्लभ जीवन सार्थक कर लो
धर्म-कर्म का मान करो
करुणा, प्रेम, स्नेह की धारा
सर्व हृदय में भरे चलो
साथ लिए चल सबको
हाथ बढ़ाओ, आगे बढ़े चलो।
रुको नहीं तुम, बढ़े चलो।
***
सत्यवती आचार्य, चंडीगढ़

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