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Chandigarh (Sursaanjh.com Bureau), 27 June:
तीसरे लिखत पॉइटिका का शानदार आयोजन
बॉलीवुड के मशहूर गीतकार इरशाद कामिल की मां की याद में बनी बेगम इकबाल बानो फाउंडेशन ने अपने तीसरे त्रिभाषीय कवि सम्मेलन लिखत पोएटिका का सेन्ट्रल स्टेट लाइब्रेरी के सहयोग से उनके सभागृह में किया। कार्यक्रम का संचालन फाउंडेशन के निर्देशक विजय कपूर ने किया जिसमें ट्राइसिटी के 18 हिंदी, पंजाबी और उर्दू के कवियों ने भाग लिया। “विजय कपूर ने बताया कि फाउंडेशन के कार्यक्रमों के जरिए आज के युवाओं को अपनी संस्कृति और कला के साथ जोड़ना है। फाउंडेशन आम शिक्षा और खास तौर पर महिलाओं की शिक्षा पर अपना योगदान दे रही है। बच्चों को भी संस्कृति से जोड़ने के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। जल्द ही किस्सा गो नाम की शृंखला भी शुरू करेंगे जिसमें कहानिकारो को अपनी रचनाओं को पढ़ने का मौका इस मंच के सौजन्य से मिलेगा।” ![]() ![]() कार्यक्रम के अध्यक्ष थे जाने माने साहित्यकार और रशियन डिपार्टमेंट पंजाब यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष डॉक्टर पंकज मालवीय। डॉक्टर निज़ा सिंह ने विशेष अतिथि के तौर पर भाग लिए। विशेष अतिथि के रूप में रंगकर्मी और साहित्यकार डॉक्टर कैलाश आहलूवालिया शामिल हुए। सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी की ओर से लाइब्रेरियन राजवीर कौर ने नुमाइंदगी की। कार्यक्रम में अपनी रचनाओं को सुनाते हुए शिवम ने.. झगड़ के दूर इतना ही गया है/ मनाने भर की दूरी पे खड़ा है।
जगदीप सिद्धू ने ..की तेरे रोज़ दे जलूस, धरने की कढ़ना एन्हा विचों/ मां सब कुझ बदल देना एह जलूस ता ने कि असीं वी तुर सकीऐ चार बंदिएां ‘च। डॉक्टर कैलाश ने …में लिखे अधलिखे के बीच अपनी जगह तलाशता रहा। आहलूवालिया ने … डॉक्टर निर्मल सूद ने .. मां बयान नहीं होती/ कैसे करूं शब्दों की ज़ुबान नहीं होती। जगदीप नूरानी ने..हरगिज़ न पहुंचेगा मंज़िल ते/ जे हर कदम पैरा दे छाले तकेगा। डॉक्टर दलजीत ने.. मन को अपने समझा लेना ही सुख है/कितने बरसों से मन कस्तूरी ढूंढ रहा है। परमजीत परम ने..हास्यां दे दे नाल सांवा रहन लई / कुछ गम ता दे मेरे खुदा। विजय कपूर ने ..भीतर की ज्वाला/ पता नहीं देह को कहां लाकर खड़ा करेगी/नैतिकता , अनैतिकता के / किन-किन खांचों में टुकड़ा-टुकड़ा होगी यह देह/ पता नहीं। अश्वनी भीम ने…बुरा नहीं है ताकना यौवन में सौंदर्य को/ और झांकना एक-आध बार घर में पड़ोसियों के। डॉक्टर पंकज मालवीय ने..मेरे देश के गरीबों तुम तो बहुत खास हो, तुम्हारे इतने शुभचिंतक फिर भी तुम उदास हो।
सुरेंद्र बंसल ने .. सहरा की तपती धूप थी , चुभते बबूल थे लेकिन उसी सफ़र में ,कहीं दूर फूल थे। विमल कालिया ने.. मैं वो कहां/जो मैं हूं/मैं तो बस वो हूं/ मेरे हालात जो हैं। राजेश पंकज ने …दुनिया में आया हो कुछ रोज़ ही पहले/उंगली को थाम रिश्ता बनाती हैं उंगलियां। रेखा मित्तल ने .. मां भोर होने से पहले उठती है/ या भोर मां के उठने से होती है। गौरव आहूजा ने .. एक लफ्ज़ है /जो मेरा तआकुब करता रहता है/ या शायद मैं दीवारें फांद के उसके पीछे/ बहुत मुश्किल है यह बताना/ कौन किसका मुजरिम है। इसके अतिरिक्त सतिंदर गिल, कमल अरोरा और डॉक्टर सुरिंदर पाल ने भी अपनी रचनाएं पढ़ीं। कार्यक्रम में इरशाद कामिल के बड़े भाई परवेज़ अख्तर भी शामिल हुए और प्रतिभागियों को बधाई दी। अध्यक्ष डॉक्टर मालवीय ने सभी प्रतिभागियों को सराहते हुए कहा “कवि बनाया नहीं जा सकता, कविता मन के भीतर से आती है। इसे केवल समय तराशता है।”
श्रोताओं के रूप में शहर के बड़े बड़े साहित्यकार कार्यक्रम में उपस्थित रहे जिनमें प्रमुख हैं सुभाष शर्मा, कमल अरोरा, डॉक्टर रोमिला वढेरा, अजय सिंगला, मान्या कपूर, डॉक्टर प्रसून प्रसाद, के के वालिया, डॉक्टर शशि प्रभा,तरसेम, डॉक्टर नवीन गुप्ता आदि।
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