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अभिव्यक्ति की मासिक गोष्ठी का आयोजन हुआ – विजय कपूर

Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 1 Feburary:
ट्राइसिटी की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति की मासिक गोष्ठी 1 फरवरी को डॉक्टर रोमिका वढेरा की मेज़बानी में उनके निवास स्थान 1036/ फेस 4 मोहाली में हुई। इसका संयोजन और संचालन साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर ने किया। इसमें साहित्य प्रेमियों को शब्दों के जादू से रूबरू होने का अवसर मिला। कार्यक्रम में ट्राइसिटी  के ख्यातिप्राप्त कवियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का पाठ किया। कार्यक्रम का उद्देश्य साहित्य, कला और संस्कृति को बढ़ावा देना है, और साथ ही छिपी हुई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करना है। यह गोष्ठी नई पीढ़ी को साहित्य की ओर आकर्षित करने और लेखन के प्रति उनकी रुचि को प्रोत्साहित करने का माध्यम है।
गोष्ठी दो चरणों में सम्पन्न हुई। पहले चरण में काव्य रस का आनंद प्रदान करते हुए रजनी पाठक ने बचपन में तितलियों को पकड़ने का शौक़ था पीछे से अक्सर मां की आवाज़ आती अब बस करीना मदान ने रिश्तों की उधेड़बुन बुनती है जिंदगी का ताना बना रिश्ते साथ चलते है ताउम्र दुआओ की तरह।” डॉक्टर प्रसून ने “बदल जाता है सम्पूर्ण परिदृश्य पिता की नौकरी भाई-बहनों का ब्याह भुरभुराती दीवार सा माँ-बाप का भविष्य।”
विजय कपूर ने “जो अशब्द है अव्यक्त है उसी की खोज में रहती है भाषा और हम।” रोमिका वडेरा चाहता है हर कोई/ बाद मरने के मिले जन्नत” आर के सुखन ने “हवा के साथ मैं उड़ तो चला हूं ज़मीं से दूर होता जा रहा हूं।” डॉक्टर दलजीत कौर ने “ताउम्र मैने न रब मांगा न खुदा की तलाश की/मुझे चाहिए था एक इंसान/ इंसानियत से भरा।”
परमिंदर सोनी ने “पहली साँस जब ली इस जग में रिश्तों की शुरुआत हो गई/ आँख खुली तो देवी सी माँ और प्यार लुटाते पिता से मुलाकात हो गई/ मेरे जीवन की शुरुआत हो गई।” निर्मल सूद ने “माँ का होना और माँ होना/ दोनों है वरदान प्रभु के/ माँ सृष्टि की उत्तम सृजना/ माँ की ममता से भीगे घर का कोना-कोना।” डॉक्टर सारिका धूपड़ ने “महबूब कभी बेवफ़ा नहीं होते/ ये जाना हमने, बेवफ़ाई के कूचों में घूमकर आने के बाद।”
राजिंदर सराओ ने “मैं दियां बाता नू/ जदो सारे रिश्ते जियूंदे सन/हंस हंस के दर्द बधाऊअंदे  सन।” डॉक्टर नवीन गुप्ता ने “ऐ ख़ुदा ख़ून के रिश्तों में यह कमाल भी कर दिया होता/ जहां हमशक्ल किया था हम ख़याल भी कर दिया होता।” हरमनजीत रेखी ने “कहीं गलती से होश की बात न कर बैठें/ फिर ज़िंदगी का वही हिसाब न कर बैठें।” आर के सौंध ने “रास्ते सजॆ, कारवां बने, मंज़िलॆ भी कायम हुई;/ चाहते फिर भी अधूरी, ख्वाहिशॆ फिर भी अधूरी,हसरतें फिर भी अधूरी।” अश्वनी भीम ने “वाहनों की भीड़ से घबराई थी/ या बूढ़ी हो आई थी/ नहीं पता क्या सच्चाई थी/ कि एक दिन सड़क को अपने बचपन की अर्थात पगडंडी की याद हो आई थी।” डॉक्टर प्रेम ओझा ने “आनंद न बाहर / न चीजों में /न इच्छाओं की इन भेड़ों में / आनंद है भीतर मौन की गहराई में” डॉक्टर सुनीत मदान ने “मैंने बुनाई के लिए सिलाईयां खरीद रखी हैं/ बहुत दिनों से सोच रही हूं उनसे क्या बुनूं” जैसी अनूठी रचनाओं का पाठ किया। दूसरे चरण में डॉक्टर अशोक वडेरा ने खूबसूरत कहानी ‘प्यारे मोहन जी’ को पढ़ा। विजय कपूर ने बहुत मार्मिक कहानी “लौटते हुए” का एनिमेटेड पाठ किया।

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