Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 2 May:
चंडीगढ़ की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति ने सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी चंडीगढ़ के सहयोग से पंजाबी के मशहूर कहानीकार गोवर्धन गब्बी की कहानियों के हिंदी अनुवाद के संग्रह “नयन-भोग” के विमोचन का आयोजन, लाइब्रेरी की सभागार में ट्राइसिटी के प्रबुद्ध साहित्यकारों की उपस्थिति में किया। विद्या विकास अकादमी द्वारा प्रकाशित इस संग्रह में स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर आधारित दस कहानियां है।


कार्यक्रम का सफल आयोजन और संचालन अभिव्यक्ति के अध्यक्ष विजय कपूर का था। पुस्तक के बारे में बात करते हुए पुस्तक के लेखक गोवर्धन गब्बी का कहना था “मेरी कहानियों पुरुष और स्त्री संबंधों को वैसे ही सामने रखती हैं जैसे हमेशा से रहें हैं। ये कहानियों पाठकों के लिए आईने की तरह सामने आएंगी, पाप और पुण्य से परे जीवन को विश्लेषित करती हुई।” कहानियों की अनुवादक डॉ जसविंदर बिंद्रा का कहना था “गोवर्धन गब्बी की सभी कहानियाँ पुरुष-स्त्री के संबंधों को अलग दृष्टिकोण से पेश करती है। इन संबंधों का सिलसिला आदिम जगत् से चला आ रहा है। इसलिए यह संबंध न नवीन है और न ही आधुनिक दौर की उपज। संग्रह में शामिल सभी कहानियाँ संबंधों की एक नई परिभाषा को प्रस्तुत करती हैं, जिसमें पाप-पुण्य जैसे भाव दूर-दूर तक नहीं हैं।” वरिष्ठ साहित्यकार विजय कपूर का कहना था” गोवर्धन गब्बी की ये कहानियाँ आधुनिक जीवन की विसंगतियों का एक संपूर्ण लेखा-जोखा हैं। वे हमें हमारे अपने ही ‘प्रतिबिंब’ दिखाती हैं, जो कभी-कभी डरावने हो सकते हैं, लेकिन वे सच हैं। इन कहानियों का संकलन पाठकों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाता है जहाँ वे समाज, परिवार और स्वयं के अस्तित्व के अनसुलझे सवालों से रूबरू होते हैं।” समालोचक डॉ विमल कालिया का कहना था “समाज प्रयोगात्मक है, समाज गतिशील है। समाज सोच में परिवर्तन को स्वीकार करता है। इन कहानियों के पात्रों को अगर हम जीने दें उनके हिस्से का जीवन और अपना निर्णय ना थोपें तो ये रिश्ते वर्जित नहीं कहलाएंगे। सो इन कहानियों को खुले मन से पढ़ने की ज़रूरत है। पढ़ने वालों की बहुत सी भ्रांतियां सुलझेंगी।” डॉ अश्वनी शांडिल्य का कहना था”अनैतिक यौन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में मनुष्य के चरित्र का चित्रण है।” कहानीकार और कवयित्री सीमा गुप्ता का कहना था” कहानियों में अगर स्त्री पीड़िता है तो आत्मविश्वासी और उम्मीद से भरी हुई भी है। पुरुष प्रधान समाज में एक पुरुष होकर स्त्री के अस्तित्व के संवेदनशील,मनोवैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में रखना और उसके आत्मसम्मान को बचा लेना ख़ासकर वर्जित रिश्तों की इन कहानियों में बड़ी बात है।”
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में अभिव्यक्ति की मई माह की गोष्ठी में जाने-माने लेखकों ने भाग लिया। खास तौर पर कार्यक्रम में उपस्थित रही बॉलीवुड की गीतकारा गिन्नी दीवान ने “कुछ भी पहले जैसा कहां रहा?”, अर्चना आर सिंह ने “जब औरत चुप हो जाती है, तो लफ़्ज़ कहीं सो जाते हैं, जो कल तक शोर मचाते थे, वो पत्थर के हो जाते हैं।” विजय कपूर ने “जब आसमान से लोहे की बारिश होती है, और ज़मीन अपने ही बच्चों का रक्त पीने लगती है, तब तुम्हारा हाथ थामना कोई विलासिता नहीं, एक क्रांति है।” रवीन्द्र टंडन ने “माँ चौंके में होती थी जब, बहती थी अविरल तब उल्लास की बयार, बजता था संगीत राग-ए छौंक का।” परमिंदर सोनी ने “यह यादों की चुभन स्याही सी ज्यों घड़ रही चित्र विचित्र।” आर के सौंध ने “कुछ तो रह गई होगी कमी तेरे निज़ाम में एक खुदा; कि इन्सान बढ़ते जा रहे हैं, इन्सानियत घटती जा रही है।” एस के सिंह ने “मैं ऱोज पहनकर निकलता हूँ एक लोहे का जूता।” कुसुम धीमान ‘कलिका’ ने सुनाई “माँ की सेवा है प्रभु सेवा, जो करता पाता है मेवा, माँ गंगा यमुना कहलाती, घर को पावन धाम बताती।” अन्नू रानी शर्मा ने “गीत, कहानी, दोहा, कविता या फिर कोई ग़ज़ल बनाना किसी डूबते दिल की नैया या फिर बस तिनका हो जाना लिखना भी है फ़र्ज़ निभाना” आर.के.”सुख़न” ने “जाने कैसा ख़ुमार था मुझको अपने क़ातिल से प्यार था मुझको।” अशोक वडेरा ने पढ़ा “तुम कुछ पूछते तो बताता न, तुमने पूछा नहीं तो मैने बताया नहीं।” शीनू वालिया ने “माँ बनना आसान है फिर भी, माँ होना आसान नहीं सब कुछ पा कर खुद को खोना, लगता है पर होता ये आसान नहीं।” शिप्रा सागर ने “क्रांति का आगाज़ है मेरी ग़ज़ल हां वतन के नाम है मेरी ग़ज़ल।” शहला जावेद ने सुनाया “लम्हे तेरी यादों के जो ख़्यालों में भीड़ लगाते थे कभी वही मेरी ज़ात को तन्हा किस क़दर कर गए।” राजिंदर सराओ ने “लोग कहते पागल मुझे, तुम ही कहो मैं कौन हूं, कल खुदा था तेरे लिए, आज कहो मैं कौन हूं।” डॉ पारस बमोला ने “एक सवाल है जवाब सरेआम बताओ।” रश्मि शर्मा ‘रश्मी’ ने “मेरी मुट्ठी में दे अक्षर, बड़के को संगीत थमा कर छोटे को दे एक्टिंग पापा, इतनी जल्दी चले गए क्यों।” निर्मल सूद ने “तन की लाज ढ़कते हैं वस्त्र परदे ढ़कते घर की इज़्ज़त बहुत कुछ छिपा लेते हैं स्याह सफ़ेद अपने भीतर।” मीना सूद ने सुनाई “कल रात मैंने देखा इक दिन चांदी-सा चमकीला।” ममता ग्रोवर ने…. “पतझड़ चली गई आकर बहार अभी बाक़ी है मकाँ को घर बनाने का ख़ुमार अभी बाक़ी है।” करीना मदान ने “हौसला चलने का कायम रखें खुदा , मंजिलें खुद-ब-खुद पास चली आएंगी।” डॉ. नीरू मित्तल नीर ने “रौंद दो पैरों से चाहे मैं फिर उठ जाती हूँ घास हूँ न मैं!” दर्शना सुभाष पाहवा ने “सिर रखने के लिए कंधा ढूंढती, मेरे अंदर की औरत।” बी बी शर्मा ने “कोई साधारण सा क़िस्सा नहीं होने वाला, भीड़ का अब वो हिस्सा नहीं होने वाला।” अलका कांसरा ने पढ़ा “स्त्री क्या है? क्या बहुत मुश्किल है इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना, क्या स्त्री कोई नदी है जो बस बहना जानती है, नहीं, स्त्री तो सागर है।” जैसी सारगर्भित कविताओं का पाठ किया। गोष्ठी के तीसरे स्त्र में विमल कालिया ने ‘जमीन – आसमान’ नाम की सुंदर और संजीदा कहानी का एनिमेटेड पाठ किया।

