Chandigarh (sursaanjh.com bureau), 4 July:
‘अभिव्यक्ति’ साहित्यिक संस्था, चंडीगढ़ की जुलाई माह की गोष्ठी पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ माइक्रोबायोलॉजी में डॉ. नवीन गुप्ता की मेज़बानी और संस्था के अध्यक्ष, वरिष्ठ साहित्यकार और रंगकर्मी विजय कपूर के संयोजन और संचालन में सफलतापूर्वक आयोजित हुई। यह गोष्ठी न केवल साहित्य के सृजन का एक मंच बनी, बल्कि बौद्धिक संवाद और वैचारिक आदान-प्रदान का एक जीवंत केंद्र भी साबित हुई। इस गोष्ठी में ट्राइसिटी के प्रतिष्ठित और नवोदित साहित्यकारों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया।


काव्य सत्र: जज्बातों का समागम गोष्ठी के पहले सत्र में रचनाकारों ने अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोया। डॉ. नवीन गुप्ता ने “सभी अपने हैं चाहो तो ये वहम पाल रखो/ हक़ीक़त ये है कि अपना ख्याल ख़ुद आप रखो।” विजय कपूर ने “पीड़ा का कोई बाह्य आकार नहीं होता/ वह तो अंतःकरण का एक ऐसा निशब्द कोलाहल है/ जहाँ स्मृतियाँ चिता की राख की तरह हर पहर मस्तक पर त्रिपुंड बनकर सजती हैं।” राजेंद्र सौंध ने “मेरे अरमानों कि कीमत बहुत भारी पड़ी/ नाकाम हसरतों का जनाजा खुद उठाया मैंने।” एस. के. सिंह ने “तुमने सड़कों पर सुबह – शाम घर से काम पर निकलते हुये/ या दफ्तर से घर लौटते हुये फ़ोन पर बात करती लड़कियों को तो देखा ही होगा।” रेखा मित्तल ने “देख मां का आंगन/ याद आया बहुत कुछ।” रवीन्द्र टंडन ने “बहुत बार मिलता है मुझे मेरा सिरहाना/ कुनकुना सा, कुछ नम सुबह सुबह।” आर.के. ‘सुख़न’ ने “हम को तो इस इश्क़ ने मारा तुम किस पे कुर्बान हुए/ एक ही था अंजाम हमारा और बहाने क्या क्या थे।” डॉ. निर्मल सूद ने “दहलीज़ केवल घर और बाहर की संधि रेखा नहीं/ घर के संस्कार व्यवहार का पूरा संसार है/ दहलीज़ परिवार के सम्मान का प्रवेश द्वार है।”
अश्वनी मल्होत्रा ‘भीम’ ने “छोड़ो बापू ये सत्य, अंहिसा का प्रण/ भगत, सुभाष, आजाद भीतर जगाओ अब।” सतिंदर कौर ने “कैसे करना है? क्या करना है? बहुत से लोग सिखाते हैं/ सही राह को चुनने की तरकीब तुम्हें समझाते हैं।” डॉ दलजीत कौर ने “हो चुका है उसके खून में शामिल
धोखा इस तरह/ कि आदमी सांस भी लेता है तो ठगता है किसी को।” दर्शना सुभाष पाहवा ने “नशा रहित भारत की तुम नई पहचान हो/ गरिमामय दृश्य का तुम तेजोमयी वितान हो।” नीरू मित्तल ने “समय की पीठ पर कर हस्ताक्षर हमने भी अपनी छाप लगाई/ आई नज़दीक जग से विदाई।” शहला जावेद ने “कल जो फैलाया था अलगनी पे/ भीगा, नम एहसास सूख जाने के लिए।” रश्मि शर्मा ‘रश्मी’ ने “मैं धरती टुकड़ों में बंट कर/ तुझ को आँगन दे जाती हूं।” डॉ. सत्यभामा ने “साथ रहने के मायने/ दैहिक संतुष्टि, बिस्तरबाजी, व्यक्तिनिष्ठता, व्यक्तिसपेक्ष कोरे शब्द।” मनीष कौशल ‘तालिब’ ने “तू अंधेरों से आगे उजालों की/ सहर देख।” कुसुम धीमान ‘कलिका’ ने “सरल नहीं है सेवा करना, काम कठिन जो नर्स करे/ धन संचय कर आशीषों का, सेवा स्वीकृति हर्ष करे।” कृष्णा गोयल ने “शहादत के लिए हो सर अपना/ तिरंगे में लिपट कर हों विदा हम।” तिलक सेठी ने “कुछ बरसों का यहां ठिकाना है सबका/ दुनिया में सब आते जाते रहते हैं।” ममता ग्रोवर ने “ऐ बारिश, अब के बरस, कुछ इस तरह से/ बरस कि सबके मन की रंजिशें धुल जाएँ।” खुशनूर कौर ने “सच मन्नी एह अजे मैनू ही सुनदे ने/ जे किधरे तैनू सुनदे मैं फ़ना हो जाना सी।” पारस ने “मैं कहता ना था तुमसे/ ये बताओ आगे क्या होगा।” नवनीत बक्शी ने “सूख गई है मेरी कलम की स्याही/ अब क्या करूं?” और अन्नू रानी शर्मा ने “मंज़िल पाने की खातिर तो कदम बढ़ाना ही होगा/ धर हाथों पर हाथ भला कब सपने पूरे होते हैं।” जैसी सारगर्भित काव्य रचनाओं से माहौल को कवितामयी कर दिया। साहित्य की ये पंक्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि संवेदनाओं का संसार अभी भी जीवित है और साहित्य के माध्यम से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहा है।
गद्य सत्र: व्यंग्य और लघु कहानी गोष्ठी के दूसरे सत्र में डॉ. पंकज मालवीय ने लघु कहानी ‘नवाबी शौक’ का पाठ किया। यह पान मसाला खाने के शौक से उत्पन्न भ्रम की व्यंग्य कहानी है। व्यंग्य विधा पर चर्चा करते हुए साहित्यकारों ने माना कि हास्य के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर प्रहार करना सबसे प्रभावी माध्यम है। इसी क्रम में, अश्वनी ‘भीम’ ने व्यंग्य ‘कठिनाईयां और अवसर’ का दिलचस्प पाठ किया। इस कार्यक्रम में डॉ. रोमिका वढेरा,सुरिंदर कुमार, डॉ. अशोक वढेरा , रवीश काला, महिंद्र सानी, सोनिया राय, राजवीर और साहिल ने भी विशेष रूप से भाग लिया और अपनी सक्रिय उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
संपर्क: विजय कपूर अध्यक्ष, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, चंडीगढ़.

